विदेश मंत्री एस जयशंकर की रूस यात्रा के बाद रूस-यूक्रेन के बीच शांति वार्ता की उम्मीद जगी है। जयशंकर के रूस यात्रा के दौरान ही रूसी फौज द्वारा खेरसोन इलाके से वापसी के बाद युद्ध खत्म होने का माहौल बन रहा है। कूटनीतिक हलकों में इस बात को लेकर काफी चर्चा है। रूसी यात्रा के बाद अमरीकी विदेश मंत्री ने भारतीय विदेश मंत्री के साथ आसियान सम्मेलन के दौरान बातचीत की है। उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि राष्ट्रपति पुतिन वार्ता के लिए कितना तैयार हैं? रूस इस वार्ता में शामिल होने के बदले क्या चाहता है? अमरीका एवं भारत के विदेश मंत्रियों के बीच हुई बातचीत के बाद इंडोनेशिया में होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के दौरान अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध बंद करवाने तथा संवाद कायम करने के मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हो सकती है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव भी इंडोनेशिया पहुंचे हैं। इस दौरान उनसे भी इस मुद्दे पर विस्तार से बातचीत हो सकती है। रूस ने बीते सितंबर में यूक्रेन के डोनाबास इलाके में मौजूद दोनेत्स्क एवं लुहांस्क गणराज्यों को अपने में मिला लिया था। मिलाए गए क्षेत्रों में खेरसोन और जेपोरिझझिया भी शामिल थे। रूस के इस कदम पर यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की तथा पश्चिमी देशों ने कड़ी आपत्ति व्यक्त की थी। जेलेंस्की ने यहां तक कहा था कि रूस से अगली बातचीत केवल नए राष्ट्रपति के साथ ही हो सकती है। पुतिन के साथ भविष्य में कोई वार्ता नहीं होगी। इसके बाद से ही शांति वार्ता पर विराम लग गया था। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण दुनिया के देशों खासकर यूरोपीय देशों में खाने-पीने की चीजों, तेल एवं गैस की किल्लत हो गई है। इसके कारण महंगाई चरम सीमा पर पहुंच गई है। यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति डंवाडोल हो गई है। अब इस युद्ध को लेकर यूरोपीय देशों में अमरीका की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। आने वाले जाड़े के मौसम में तेल एवं गैस की किल्लत से लोगों का जीना हराम हो जाएगा। इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए अमरीका अब रूस और यूक्रेन के बीच संवाद स्थापित करवाना चाहता है। इसके लिए अमरीका भारत को यह जिम्मेवारी सौंपना चाहता है, क्योंकि इस पूरे युद्ध के दौरान भारत की भूमिका तटस्थ रही है। अब अमरीका भी यूक्रेन पर बातचीत में शामिल होने का दबाव डाल रहा है। ऐसी खबर है कि अमरीका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवान ने यूक्रेन की राजधानी कीव का दौरा किया था। सुलिवान लगातार रूसी राष्ट्रपति के विदेश नीति के सलाहकार यूरी उशाकोव और रूस की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव निकोलाई पेत्रुशेव के साथ संपर्क में हैं। लेकिन यूक्रेनी राष्ट्रपति द्वारा वार्ता में शामिल होने के लिए रखी गई शर्त रूस को मानना कठिन लग रहा है। जेलेंस्की ने वार्ता के लिए यूक्रेन के जीते इलाके को लौटाना, यूक्रेन को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति, हर कथित युद्ध अपराधी को सजा देना और यह गारंटी की रूस फिर कभी यूक्रेन पर हमला नहीं करेगा जैसी शर्त को रूस कभी स्वीकार नहीं करेगा। अब देखना है कि जेलेंस्की की शर्तें तथा अमरीका का बयान केवल जनमत को शांत करने के लिए है या फिर दोनों देश वास्तव में युद्ध को बंद कराने के प्रति गंभीर हैं। अगर जल्द इस युद्ध को बंद कराने के लिए वार्ता शुरू नहीं हुई और दोनों देश अपने-अपने जिद्द पर अड़े रहे तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। दुनिया अभी परमाणु युद्ध एवं तीसरे विश्वयुद्ध के मुहाने पर खड़ी है, जो मानवता के लिए अच्छी बात नहीं है। खेरसोन से लौट रही रूसी फौज की खबर को जेलेंस्की अपनी जीत के रूप में दिखाकर वार्ता में शामिल हो सकते हैं। ऐसा लगता है कि रूस भारत के दबाव में वार्ता शुरू करने के लिए खेरसोन से अपने फौज की वापसी की है। यह वार्ता तभी सफल हो सकती है, जब रूस के साथ-साथ अमरीका सहित पश्चिमी देश भी वास्तव में इसके समर्थन में आएं। जेलेंस्की तथा पुतिन दोनों ही अपने-अपने देश की जनता को यह दिखाने का प्रयास करेंगे कि उन्होंने क्या-क्या हासिल की है। अब सबकी नजर मोदी और बाइडेन के मुलाकात पर टिकी हुई है।
रूस-यूक्रेन वार्ता की पहल
