रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच विदेश मंत्री एस जयशंकर की रूस यात्रा सामरिक एवं कूटनीतिक दोनों ही दृष्टिकोण से काफी महत्वपूर्ण रही। अमरीका सहित पश्चिमी देशों की नजर इस यात्रा पर लगी हुई थी। जयशंकर ने अपनी यात्रा के दौरान रूस विदेश मंत्री तथा वहां के उप-प्रधानमंत्री के साथ द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक मुद्दों पर चर्चा की। जयशंकर ने कहा कि भारत और रूस के संबंध मजबूत हैं तथा समय की कसौटी पर हमेशा खड़े उतरे हैं। दूसरी तरफ रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लॉवरोव ने कहा कि भारत और रूस मेक इन इंडिया के तहत हथियारों का निर्माण करेंगे। इस यात्रा के दौरान व्यापार बढ़ाने के मुद्दे पर भी विस्तार से चर्चा हुई। मालूम हो कि उप-प्रधानमंत्री के पास वाणिज्य एवं व्यापार का विभाग भी है। पश्चिमी देशों की नजर रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत के विदेश मंत्री की पहल पर थी। जयशंकर ने अपने समकक्ष से स्पष्ट रूप से कहा कि अभी का समय युद्ध करने का नहीं है। रूस और यूक्रेन दोनों ही देशों को कूटनीतिक एवं बातचीत के द्वारा समस्या का हल निकालना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पहले ही रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ बातचीत से समस्या का हल करने की सलाह दे चुके हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के नौ माह पार होने के बाद इसका असर केवल दोनों देशों की आर्थिक स्थिति के साथ-साथ दुनिया के कई देशों पर भी पड़ा है। खासकर यूरोपीय देशों की आर्थिक स्थिति इस युद्ध के कारण चरमरा रही है। अमरीका ने भी यूक्रेन से कहा है कि वह बातचीत की मेज पर आए। रूसी राष्ट्रपति ने भी बातचीत के संकेत दिए हैं। अब पूरी दुनिया की नजर भारत पर है। दुनिया के देशों का मानना है कि भारत इस युद्ध को बंद करा सकता है, क्योंकि वह पूरे मामले में तटस्थ रहा है तथा पुतिन के साथ मोदी के अच्छे संबंध हैं। लेकिन वार्ता से पहले यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की जिस तरह की शर्त रख रहे हैं उसके आधार पर वार्ता आगे बढ़ना मुश्किल है। अगर भारत रूस को वार्ता के लिए राजी करता है तो अमरीका पर भी जिम्मेवारी होगी कि वह यूक्रेन को सकारात्मक बातचीत के लिए प्रेरित करे। इसके बाद इंडोनेशिया में जी-20 शिखर सम्मेलन आयोजित होना है, जिसमें अमरीकी राष्ट्रपति जो बाइडेन एवं रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन एक ही मंच पर होंगे। अमरीका को इस युद्ध से जितना फायदा लेना था वह ले चुका है। अब यूरोपीय देशों में अमरीका की भूमिका को लेकर सवाल उठने  लगे हैं। इसका कारण यह है कि तेल एवं प्राकृतिक गैस की कमी के कारण महंगाई तेजी से बढ़ी है जिसका असर आम जनता पर पड़ रहा है। चीन अमरीका के लिए चुनौती बना हुआ है। ऐसी स्थिति में अगर अमरीका रूस से उलझा रहा तो उसे चीन के मोर्चे पर कमजोर पड़ सकता है। हिंद प्रशांत क्षेत्र में उत्तर कोरिया द्वारा किए जा रहे मिसाइल परीक्षण ने अमरीका एवं उनके सहयोगी देशों की चिंता बढ़ा दी है। इस समय दुनिया  बारूद के ढेर पर बैठी हुई है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रूस-यूक्रेन युद्ध बंद कराने के लिए जो पहल की है वह स्वागतयोग्य है। विदेश मंत्री जयशंकर ने अपनी पहल से लोगों में आशा जगाई है। अब देखना है कि वे कहां तक सफल हो पाते हैं। इसके लिए दोनों देशों को सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ना होगा।