सुप्रीम कोर्ट ने आर्थिक रूप से कमजोर सवर्ण वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण के प्रावधान को बरकरार रखा है। केंद्र सरकार ने वर्ष 2019 में सरकारी नौकरियों में गरीब सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में 103वें संशोधन कराया था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में संविधान के 103वें संशोधन वैधता को दो के मुकाबले तीन मतों  के बहुमत से कायम रखा। केंद्र के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 40 याचिकाएं दाखिल की गई थीं,  जिन पर सुनवाई चल रहा था। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित की अगुवाई में पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया गया था, जो 103वें संविधान संशोधन की वैधता को चुनौती देने वाली सभी याचिकाओं पर विचार कर रहा था। न्यायालय ने इस पर सुनवाई  करने के बाद 7 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। पीठ ने एटार्नी जनरल केके बेणु गोपाल तथा सॉलिस्टर जेनरल तुषार मेहता सहित अन्य वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इस संबंध में साढ़े छह दिनों तक लगातार बहस हुई थी। इन सभी याचिकाओं चार अलग अलग फैसले सुनाए गए। न्यायमूर्ति दिनेश माहेश्वरी, न्यायमूर्ति बेला एम त्रिवेदी एवं न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला ने कानून को बरकरार रखने के पक्ष में तथा मुख्य न्यायाधीश यूयू  ललित एवं न्यायाधीश एस रवींद्र भट्ट ने संविधान संशोधन के विरोध में फैसला दिया। न्यायमूर्ति माहेश्वरी ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि 103वें संशोधन को संविधान के मूल ढांचे को भंग करने वाला नहीं कहा जा सकता। न्यायमूर्ति त्रिवेदी ने कहा कि 13वें संविधान संशोधन को भेदभाव के आधार पर रद्द नहीं किया जा सकता।  इस संशोधन को ईडब्ल्यूएस के कल्याण के लिए उठाए गए संसद के सकारात्मक कदम के तौर पर देखना होगा। न्यायमूर्ति पारदीवाला ने उपरोक्त दोनों न्यायाधीशों को फैसले पर सहमति जताते हुए कहा कि आरक्षण का मकसद सामाजिक न्याय सुनिश्चित करना है। न्यायमूर्ति भट्ट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण संबंधी संविधान संशोधन पर असहमति जताते हुए उसे रद्द कर दिया। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश यूयू ललित के विचार से सहमति व्यक्त की। कई याचिकाकर्ताओं ने इस आरक्षण का विरोध किया था। उनका कहना था कि आर्थिक मानदंड वर्गीकरण के लिए यह आधार नहीं हो सकता। ऐसे में न्यायालय को फैसले पर पुनर्विचार करना चाहिए। दूसरी तरफ एटार्नी जनरल और सॉलिस्टर जनरल ने संशोधन का पुरजोर बचाव किया था। इन दोनों का कहना था कि यह आरक्षण सामाजिक एवं आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की सीमा से छेड़छाड़ किए बिना दिया गया है। इस मुद्दे पर अब देश में राजनीति भी शुरू हो गई है। जहां भारतीय जनता पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत कर रही है, वहीं कुछ दूसरी पार्टियां इसके कुछ प्रावधानों को लेकर प्रश्न उठा रही हैं। कई विपक्षी नेताओं की मांग है कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं पिछड़े वर्ग को भी शामिल किया जाना चाहिए। सरकार का तर्क है कि इन सभी श्रेणियों के लिए पहले से ही आरक्षण का प्रावधान है। ऐसी स्थिति में ईडब्ल्यूएसके तहत उनको शामिल करना उचित नहीं है। यह आरक्षण केवल सवर्णों के ऐसे कमजोर परिवारों के लिए है जो आर्थिक रूप से काफी कमजोर है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के समय को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए चुनावी शंखनाद हो चुका है। ऐसे समय में भारतीय जनता पार्टी सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को चुनावी मुद्दा बनाकर मतदाताओं को अपनी ओर निश्चित से आकर्षित करेगी। चूंकि यह फैसला मोदी सरकार द्वारा लिया गया है, इसलिए भाजपा इसको उछालने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। इस मुद्दे पर अनावश्यक राजनीति नहीं होनी चाहिए, क्योंकि समाज के हर गरीब वर्ग को न्याय मिलना चाहिए।