24 फरवरी से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध के आठ महीने से ज्यादा हो गए हैं, किंतु अभी भी यह युद्ध रुकने का नाम नहीं ले रहा है। रूस तथा यूक्रेन अपने-अपने जिद्द पर अड़े हुए हैं। रूस हर हालत में युद्ध जीतना चाहता है, जबकि यूक्रेन हथियार डालने को तैयार नहीं है। अमरीका तथा पश्चिमी देशों द्वारा दिए जा रहे हथियारों के बल पर यूक्रेन रूस के सामने चुनौती पैदा कर रहा है। दोनों ही तरफ से काफी हथियार एवं युद्ध के सामान नष्ट हुए हैं। अब नौबत परमाणु युद्ध तक आ पहुंची है। इन आठ महीनों में न सिर्फ रूस, बल्कि अमरीका के हथियारों का जखीरा भी खाली हो रहा है। इस कारण यूक्रेन को हथियारों की मदद देने का वादा निभाने में अमरीका को मुश्किल पेश आ रही है। भविष्य में इसका असर यू्क्रेन की युद्ध क्षमता पर पड़ सकता है। अमरीकी रक्षा मंत्री लॉयड आस्टिन भी इस बात को स्वीकार कर चुके हैं। उन्होंने कहा है कि दुनिया के लगभग 50 हथियार निर्माता कंपनियों के अधिकारियों से बातचीत के दौरान हथियारों का उत्पादन बढ़ाने के लिए कहा गया है। अमरीकी रक्षा मंत्री के बयान से स्पष्ट है कि अगर हथियार निर्माता कंपनियों ने अपना उत्पादन तेजी से नहीं बढ़ाया तो पश्चिमी देशों के पास हथियारों की कमी हो सकती है। अमरीका ने यूक्रेन को अब तक 17.6 बिलियन डॉलर के सुरक्षा उपकरण देने का वादा कर चुका है, जो अगले कई वर्षों तक आपूर्ति की जानी है। ऐसी खबर है कि प्रशिक्षण में इस्तेमाल होने वाले कुछ अमरीकी हथियारों की संख्या निम्नतम स्तर पर पहुंच गई है। इसी बीच अगर दुनिया में कोई दूसरा युद्ध का मोर्चा खुला तो वहां हथियारों की कमी हो जाएगी। यह सबको मालूम है कि ताइवान के मुद्दे पर अमरीका और चीन आमने-सामने हैं। कभी भी उस क्षेत्र में युद्ध की चिंगारी भड़क सकती है। इजरायल एवं ईरान के बीच तनातनी चरम पर पहुंच चुकी है। खाड़ी के देश बारूद के ढेर पर बैठे हुए हैं। उत्तर कोरिया तथा दक्षिण कोरिया एवं जापान के बीच भयंकर तनाव है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया भर के देश अपनी सामरिक क्षमता बढ़ाने में जुट गए हैं। यही कारण है कि अमरीका ने अपने वादे की तुलना में कम हथियार एवं दूसरे सिस्टम यूक्रेन को दे पाए हैं। अमरीका में भी मोबिलिटी आर्टिलरी रॉकेट सिस्टम की कमी महसूस की जा रही है। जानकारों के अनुसार अमरीका में हथियारों की कमी इसलिए हुई है, क्योंकि शीत युद्ध के बाद उसने हथियार उत्पादन का बजट घटा दिया था। वर्ष 1960 की दशक में अमरीका अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 9 प्रतिशत सेना पर खर्च करता था। 1990 में यह धनराशि घटकर 5 फीसदी और 2020 में केवल 3 फीसदी रह गई है। अचानक हथियारों की मांग ने हथियार निर्माता कंपनियों के सामने चुनौती पेश कर दी है। अब यूरोप के देशों को भी अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। यही कारण है कि जर्मनी जैसे देश को भी अपना रक्षा बजट बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ा है। जापान जैसा शांतिप्रिय देश भी अब खतरनाक हथियारों का जखीरा इकट्ठा करने लगा है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने फिर दुनिया को तीसरे विश्व युद्ध की ओर धकेलना शुरू कर दिया है। दुनिया को अब फिर से सावधान होने की जरूरत पड़ गई है।
हथियारों की कमी
