पटाखों के जलने के कारण निकलने वाले धुएं से वायु काफी प्रदूषित हो जाती है। ऐसे में पटाखों को लेकर राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा सख्ती देखने को मिल रही है। बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए यहां पर पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा हुआ है। दिल्ली में सारे तरह के पटाखों की बिक्री, भंडारण और मैनुफैक्चरिंग पर पूरी तरह रोक है। पटाखे जलाने पर छह महीने की कैद और जुर्माने की सजा है, जबकि बनाने, बेचने और स्टोर करने पर 3 साल की जेल और 5 हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा। सितंबर में सरकार ने एक बार फिर पटाखों पर पूर्ण बैन लगा दिया था। बेचने से लेकर फोडऩे तक, हर चीज पर प्रतिबंध लगाया गया। ये आदेश अगले साल जनवरी 1 तक जारी रहने वाला है। दिल्ली में पटाखे जलाने पर सजा एवं जुर्माना है तो कई बाकी राज्यों में कुछ पाबंदियां हैं, लेकिन किसी भी प्रकार की सजा का प्रावधान नहीं है। भारी मात्रा में पटाखों को जलाने का यह प्रभाव दिवाली के कई दिनों बाद तक बना रहता है, जिसके कारण कई सारी बीमारियां उत्पन्न होती हैं और इसके कारण फेफड़े सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। जले हुए पटाखों के बचे हुए टुकड़ों के कारण भूमि प्रदूषण की समस्या भी उत्पन्न होती है और इन्हें साफ करने में कई दिन समय लगता है। इनमें से कई टुकड़े नान बायोडिग्रेडिल होते हैं और इसलिए इनका निस्तारण करना इतना आसान नहीं होता है तथा समय बीतने के साथ ही यह और भी जहरीले होते जाते हैं और भूमि प्रदूषण की मात्रा में वृद्धि करते हैं। दीपावली के दौरान ध्वनि प्रदूषण अपने चरम पर होता है। पटाखे सिर्फ उजाला ही नहीं बिखेरते हैं बल्कि इसके साथ ही वह काफी मात्रा में धुअंा और ध्वनि प्रदूषण भी उत्पन्न करते हैं, जो कि मुख्यत: बुजुर्गों, विद्यार्थियों, जानवरों और बीमार लोगों के लिए कई गंभीर समस्याएं उत्पन्न करते हैं। पटाखों की तेज आवाज काफी परेशान करने वाली होती है। पटाखों के तेज धमाकों की वजह से जानवर सबसे ज्यादा बुरे तरीके से प्रभावित होते हैं। पटाखे जलाने के कारण पर्यावरण पर कई गंभीर प्रभाव पड़ रहे हैं। इसके साथ ही यह पृथ्वी के जीवन को भी प्रभावित कर रहा है। यह काफी विडंबनीय ही है कि लोग पटाखों के इन दुष्प्रभावों को जानने के बाद भी इनका उपयोग करते हैं। यह वह समय है, जब हमें अपने आनंद के लिए पटाखे जलाने को त्यागकर बड़े स्तर पर इसके दुष्प्रभावों के विषय में सोचने की आवश्यकता है। दिवाली प्रकाश का त्योहार है और वर्ष भर लोग इसका इंतजार करते हैं। इस दौरान लोग अपने घरों, कार्यालयों और दुकानों की साफ-सफाई किया करते हैं। इसके साथ ही लोग अपने घरों तथा स्थानों को सजाने के लिए नए पर्दे, बिस्तर की चादरें तथा अन्य सजावटी वस्तुओं की खरीदारी करते हैं। दिवाली के दिन को एक बहुत ही पवित्र दिन माना जाता है और कई लोग इसे अपने नए घर में स्थानांतरित होने, व्यापार और सौदा करने तथा शादी की तारीख को तय करने जैसे कुछ नया शुरू करने के लिए सबसे उपयुक्त दिन मानते हैं। दिवाली के इस उत्सव के दौरान कई प्रकार के रिवाज प्रचलित हैं, पटाखे फोडऩा उन्हीं में से एक है। एक ओर जहां अन्य सभी परंपरा और अनुष्ठान इस उत्सव को और भी ज्यादा खूबसूरत बनाते हैं, वहीं पटाखे फोडऩे जैसे कार्य इसकी साख पर बट्टा लगाने का काम करते हैं। यह रिवाज दिवाली उत्सव का दुखद हिस्सा है क्योंकि यह ना सिर्फ पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है बल्कि कई स्वास्थ्य समस्याओं को भी जन्म देता है। दीपावली पर भारी मात्र में पटाखों को जलाया जाता है। पहले से प्रदूषित वातावरण पटाखों द्वारा उत्सर्जित धुएं के कारण और भी ज्यादा प्रदूषित हो जाता है। जिससे सांस लेने में भी मुश्किल होने लगती है। पटाखें फोडऩे से कई अन्य स्वास्थ्य समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं जैसे आंखों में जलन, आंखों का लाल होना और त्वचा और फेफड़ों के संक्रमण आदि। इसके अलावा पटाखों से उत्पन्न होने वाले ध्वनि प्रदूषण का विशेष रूप से नवजात बच्चों, वृद्धों तथा जीव-जंतुओं पर काफी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
दीपावली और प्रदूषण
