काफी उठापटक के बाद आखिरकार  कांग्रेस को नया कप्तान मिल गया। सीताराम केसरी के 24 साल बाद कांग्रेस को मल्लिकार्जुन खडग़े के रूप में पहला गैर गांधी कांग्रेस अध्यक्ष मिला है। खडग़े ने शशि थरूर को बड़े अंतर से पराजित किया। कांग्रेस में इससे पहले अध्यक्ष पद के लिए चुनाव 1939, 1950, 1977, 1997 और 2000 में चुनाव हुए थे। 2000 के चुनाव में सोनिया गांधी ने जितेंद्र प्रसाद को हराकर अध्यक्ष पद हासिल किया था। गांधी परिवार के करीबी और कई वरिष्ठ नेताओं के समर्थन के चलते खडग़े की दावेदारी मजबूत मानी जा रही थी। मतदान से पहले सोनिया गांधी ने कहा था कि मैं इस दिन का लंबे समय से इंतजार कर रही थी। दूसरी ओर शशि थरूर ने अपनी करारी हार को स्वीकार करते हुए पार्टी के नए अध्यक्ष को बधाई दी। थरूर ने कहा कि वह परिणाम को स्वीकार करते हैं। थरूर खडग़े को बधाई देने के लिए उनके घर भी पहुंचे थे।  कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए गांधी परिवार की पहली पसंद तो अशोक गहलोत थे, लेकिन राजस्थान में कांग्रेस विधायकों के बागी रुख के बाद पूरा खेल बदल गया। राजस्थान प्रकरण के बाद गहलोत ने माफी तो जरूर मांगी लेकिन कांग्रेस आलाकमान का अपने इस भरोसेमंद साथी से विश्वास डगमगा गया। इसके तुरंत बाद कांग्रस की तरफ से खडग़े को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया गया। 80 वर्षीय खडग़े का जन्म कर्नाटक के बीदर जिले के वारावत्ती इलाके में एक किसान परिवार में हुआ था। उन्होंने गुलबर्गा के नूतन विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और गुलबर्गा के सरकारी कॉलेज से स्नातक की डिग्री ली। फिर गुलबर्गा के ही सेठ शंकरलाल लाहोटी लॉ कॉलेज से एलएलबी करने के बाद वकालत करने लगे। साल 1969 में उन्होंने कांग्रेस का हाथ थामा और 1972 में पहली बार कर्नाटक की गुरमीतकल असेंबली सीट से विधायक बने। खडग़े गुरमीतकल सीट से नौ बार विधायक चुने गए। इस दौरान उन्होंने गुंडूराव, एसएम कृृष्णा और वीरप्पा मोइली की सरकारों में विभिन्न विभागों में मंत्री का पद भी संभाला। वह दो बार गुलबर्गा से कांग्रेस के लोकसभा सांसद भी रहे हैं। 1969 में वह एमकेएस मील्स कर्मचारी संघ के विधिक सलाहकार बन गए,तब उन्होंने मजदूरों के लिए लड़ाई लड़ी। वह संयुक्त मजदूर संघ के प्रभावशाली नेता रहे। 1969 में ही वह कांग्रेस में शामिल हो गए। पार्टी ने उनकी लोकप्रियता को देखते हुए उन्हें गुलबर्गा कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। 2005 में उन्हें कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया। 2008 तक वह इस पद पर बने रहे। 2009 में पहली बार सांसद चुने गए। खडग़े गांधी परिवार के भरोसेमंद माने जाते हैं। इसका समय-समय पर उनको इनाम भी मिला। साल 2014 में खडग़े को लोकसभा में पार्टी का नेता बनाया गया। लोकसभा चुनाव 2019 में हार के बाद कांग्रेस ने उन्हें 2020 में राज्यसभा भेज दिया। पिछले साल गुलाम नबी आजाद का कार्यकाल खत्म हुआ तो खडग़े को राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बना दिया गया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कांग्रेस को एक अच्छा नया कप्तान मिला है। उम्मीद है कि वह देश के संविधान के अनुरुप कार्य कर भारत को काफी ऊंचाई प्रदान करेंगे, भले ही वह कार्य सत्ताधारी के रूप में हो या विपक्षी पार्टी के रूप में। फिलहाल कांग्रेस की सबसे  बड़ी चुनौती गुजरात, हिमाचल और अन्य राज्यों के विधानसभा चुनाव में पार्टी के प्रदर्शन को सुधारना है,जो फिलहाल आसान नहीं दिख रहा है। 2023 में राजस्थान और छत्तीसगढ़ में फिर से कांग्रेस को सत्ता में वापस लाने की चुनौती है। कांग्रेस के पास मध्यप्रदेश में भाजपा से बदला लेने का अच्छा मौका है, उसके बाद 2024 में खडग़े मोदी सरकार को सत्ताच्युत कर पाती है या नहीं, इस पर आज से ही सबकी नजर होगी।