समाजवादी पार्टी (सपा) के संस्थापक एवं विलक्षण प्रतिभा के धनी मुलायम सिंह यादव अब हमारे बीच नहीं हैं। उनके द्वारा लिये कई ऐतिहासिक फैसलों के लिए उन्हें याद किया जाएगा। भारतीय राजनीति में उनकी कमी की भरपाई नहीं की जा सकती। उन्होंने भारतीय राजनीति को न सिर्फ नई दिशा दी, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की इबारत भी लिखी। इटावा के सैफई में एक किसाना परिवार में जन्मे नेताजी ने अपनी प्रतिभा के बल पर राजनीति के इस मुकाम तक पहुंच पाए। मात्र 15 वर्ष की आयु में समाजवाद के पुरोधा डॉ. राममनोहर लोहिया के आह्वान पर नहर गेट आंदोलन में पहली बार जेल गए। अपने छात्र जीवन से राजनीति की शुरूआत करने वाले नेताजी तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तथा देश के रक्षा मंत्री बने। उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं राममनोहर लोहिया के आदर्शों को लोकप्रिय बनाने के लिए काम किया। जयप्रकाश नारायण के आह्वान पर आपातकाल के खिलाफ चलाए गए आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लेकर लोकतंत्र की पुनर्स्थापना के लिए आवाज उठायी थी। उनके निधन पर जिस तरह राजनीतिक दलों ने पार्टी लाइन से हटकर प्रतिक्रिया दी है वह उनकी लोकप्रियता को दर्शाता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने नेताजी को धरती पुत्र की संज्ञा देकर जमीन  से जुड़ा नेता बताया। राष्ट्रपति ने कहा कि भारतीय राजनीति उनके योगदान को हमेशा याद करेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उनके निधन पर भावुक ट्वीट कर अपनी पुरानी यादों को ताजा किया है। उन्होंने राष्ट्रीय एवं उत्तर प्रदेश की राजनीति में अलग पहचान बनाई थी। महिलाओं की सियासत में भागीदारी को लेकर भी वे काफी सजग थे। अपने राजनीतिक सफर में पिछड़ी जातियों एवं अल्पसंख्यकों के हितों की अगुवाई कर अपनी पुख्ता राजनीतिक जमीन तैयार की थी। लोकदल से जनता दल होते हुए 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी की स्थापना की। पिछड़ी जातियों को गोलबंद करते हुए अल्पसंख्यकों का साथ दिया। अयोध्या में मंदिर आंदोलन के दौरान उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश दिया, उसके बाद ही उन्हें मुल्ला मुलायम तक कहा गया, लेकिन उन्होंने अपने फैसले को सही करार देते हुए कहा कि राष्ट्रीय एकता के लिए यह जरूरी था। हिंदूवादी संगठनों ने मुलायम के गोली चलाने के आदेश की काफी आलोचना की थी। इसके खिलाफ जोरदार आंदोलन भी चलाया गया था। 1993 में मुलायम ने कांशीराम के साथ गठबंधन कर भाजपा का विजय रथ रोकने में कामयाबी हासिल की थी। मायावती और मुलायम के बीच 13 मई 1995 को इन दोनों के बीच फिर दूरियां बढ़ गईं। फिर लंबे अंतराल के बाद 15 मार्च 2018 को अखिलेश यादव ने मायावती से मुलाकात कर गठबंधन कायम किया। उसके बाद सपा-बसपा में एका में नारे भी लगे। लेकिन फिर दोनों दलों के बीच तलाक हो गया। रक्षा मंत्री के रूप में भी उन्होंने पाकिस्तान की जगह चीन को अपना मुख्य दुश्मन बताया था, जो आज के समय काफी प्रासंगिक दिख रहा है। सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री नहीं बनने के पीछे मुलायम सिंह और शरद पवार की राजनीति को जिम्मेवार ठहराया जाता है। जहां शरद पवार ने विदेश नागरिक होने का आरोप लगाकर सोनिया गांधी का विरोध किया था, वहीं मुलायम सिंह ने सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मामले में समर्थन नहीं दिया। इसके बाद ही मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने जितने कड़क फैसले लिये उतने ही दिल के काफी मुलायम भी रहे। अपने विरोधियों को भी मौका पड़ने पर गले लगाने से नहीं चूके। यही कारण है कि उनके विरोधी भी उनके व्यवहार के कायल रहे। इसका उदाहरण यह है कि कई विपक्षी नेताओं ने अस्पताल में जाकर उनका हालचाल जाना था एवं उनके शीघ्र स्वस्थ होने की कामना की थी। आज नेताजी हमारे बीच नहीं हैं, किंतु भारतीय राजनीति पर छोड़ी गई उनकी अमिट छाप याद रखी जाएगी। उनकी अनुपस्थिति में उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के कुनबे को फिर से संगठित करना उनके पुत्र अखिलेश यादव के समक्ष बड़ी चुनौती होगी। उनके भाई शिवपाल यादव बगावती तेवर अपनाये हुए हैं जिससे समाजवादी पार्टी को आगे के चुनाव में नुकसान हो सकता है।