केंद्र ने पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया(पीएफआई) पर पांच सालों के लिए प्रतिबंध लगा दिया है। पीएफआई के अलावा आठ और संगठनों पर कार्रवाई की गई है। गृह मंत्रालय ने इन संगठनों को बैन करने का नोटिफिकेशन जारी किया है। इन सभी के खिलाफ टेरर लिंक के सबूत मिले हैं। केंद्र सरकार ने यह एक्शन अनलॉफुल एक्टिविटी प्रिवेंशन एक्ट के तहत लिया है। सरकार ने कहा कि पीएफआई और उससे जुड़े संगठनों की गतिविधियां देश की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हैं। सरकार के कदम पर केंद्रीय पंचायती राज मंत्री गिरिराज सिंह ने ट्वीट किया-बाय-बाय पीएफआई। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने केंद्र के इस फैसले की जमकर तारीफ की, तो केरल के कांग्रेस सांसद के.सुरेश ने कहा कि आरएसएस पर भी पीएफआई की तरह बैन लगना चाहिए,क्योंकि दोनों संगठनों का काम तो एक जैसा है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने भी संघ पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। उल्लेखनीय है कि पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया 22 नवंबर 2006 को तीन मुस्लिम संगठनों के मिलने से बना था,इनमें केरल का नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम फॉर डिग्निटी और तमिलनाडु का मनिता नीति पसरई उल्लेखनीय हैं। यह खुद को गैर-लाभकारी संगठन बताता था। 2006 में नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट (एनडीएफ)के उत्तराधिकारी के रूप में गठित और नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट, मनीथा नीथी पासराय, कर्नाटक के साथ विलय हो गया। पीएफआई पर अकसर भारत सरकार की ओर से राष्ट्र-विरोधी और असामाजिक गतिविधियों में शामिल होने का आरोप लगाया गया है। पीएफआई खुद को एक नव-सामाजिक आंदोलन के रूप में वर्णित करता है जो लोगों को न्याय, स्वतंत्रता और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सशक्त बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। राष्ट्रीय महिला मोर्चा (एमडब्ल्यूएफ) और कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) सहित समाज के विभिन्न वर्गों को पूरा करने के लिए संगठन के पास विभिन्न विंग हैं। केरल और कर्नाटक में अक्सर पीएफआई और संघ परिवार के कार्यकर्ताओं के बीच हिंसक झड़पें होती रही हैं। 2012 में केरल सरकार ने दावा किया कि पीएफआई प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का दूसरा नाम है और इसके सिवाय और कुछ नहीं है। उच्च न्यायालय ने सरकार के रुख को खारिज कर दिया,लेकिन राज्य सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखा। समय- समय पर पीएफआई के कार्यकर्ताओं से पुलिस को घातक हथियार, बम, बारूद, तलवारें मिली हैं और उन पर तालिबान और अल-कायदा जैसे आतंकवादी संगठनों के साथ संबंध होने के कई आरोप लगाए गए हैं। इस संगठन ने भारत में मुसलमानों द्वारा सामना की जाने वाली असमानता को दूर करने के लिए मिश्रा आयोग राष्ट्रीय धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यक आयोग की रिपोर्ट के अनुरूप मुस्लिम आरक्षण के लिए अभियान चलाया था। संगठन ने निर्दोष नागरिकों को हिरासत में लेने के लिए गैरकानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के इस्तेमाल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन किया। 22 सितंबर 2022 को एनआईए, ईडी और राज्यों की पुलिस ने कुल 15 राज्यों में रेड मारी और पीएफआई से जुड़े 106 लोगों को अलग-अलग मामलों में गिरफ्तार किया। बीते मंगलवार को देश के आठ राज्यों में बड़ी संख्या में संगठन से जुड़े लोग गिरफ्तार किए गए, उनमें असम के भी 25 लोग शामिल हैं। दिल्ली में एनआईए ने पीएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओएमएस सलाम और दिल्ली अध्यक्ष परवेज अहमद को गिरफ्तार कर किया है। पीएफआई के कार्यकर्ताओं पर आतंकी संगठनों से कनेक्शन से लेकर हत्याएं तक के आरोप लगे हैं। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि पीएफआई जैसे संगठन के खिलाफ कार्रवाई अति आवश्यक है। इसलिए सरकार की ओर से जो कदम उठाए गए वे सराहनीय हैं। ऐसे में सरकार के इस फैसले को सांप्रदायिक नजरिए से देखना सही नहीं है।
पीएफआई पर प्रतिबंध
