मेघालय के जयंतिया पहाड़ पर नार्तियांग गांव में मां जयंती  देवी की शक्तिपीठ स्थित है। यहां मां सती की बांई जंघा गिरी थी तो यह 51 शक्तिपीठ में से एक माना जाता है। यह मंदिर शिलांग से 68 किलोमीटर की दूरी पर है मेघालय के महत्वपूर्ण स्थलों में से यह अपना विशेष स्थान रखता है। यह मंदिर लगभग 660 साल पुराना है। पूर्वोत्तर भारत में 3 शक्तिपीठ है जिसमें यह एक है। जहां मां का अंग गिरा था उसके ऊपर बेदी बना कर ढक दिया गया है। उसके ऊपर तीन मूर्तियां स्थापित की गई हैं। चौकी के अंदर का दर्शन सिर्फ बड़े नवरात्रा (शारदीय नवरात्रा)में ही हो पाता है, जो तीन मूर्तियां स्थापित हैं उसमें एक पुराने पत्थर की मां की प्रतिमा है और एक धातु की अष्टभुजा के दर्शन हैं जो महिषासुर को अपने पैरों से कुचल रही है। इसके साथ ही थोड़ी दूर पर काल भैरव का मंदिर है जो स्वत: प्रकट है। मंदिर का संक्षेप में इतिहास इस प्रकार है। 17वीं शताब्दी में जयंतिया के राजा  जसो माणिक थे। उन्होंने हिंदू राजा नारायण की पुत्री राजकुमारी लक्ष्मी से विवाह किया था। राजा नारायण ने मां कामाख्या के मंदिर का जीर्णोद्धार किया था और राजकुमारी लक्ष्मी महाशक्ति की परम आराधिका थी। उन्होंने अपने पति एवं राज्य के लिए हिंदू धर्म का विशेष प्रचार किया फिर राजा के सपने में मां जयंती ने दर्शन दिए एवं नार्तियांग का  पवित्र स्थान बता कर वहां मंदिर बनाने की आज्ञा दी। राजा जसो मानिक ने आज्ञा का पालन करते हुए पूरी श्रद्धा से मंदिर बनाया एवं मंदिर की पूजा अर्चना के लिए महाराष्ट्र से मराठी क्षत्रिय पुजारी को नियुक्त किया। यह देशमुख जाति से थे तब से अब तक उन्हीं की 30वीं पीढ़ी अनिल देशमुख मां की सेवा कर रहे हैं।