नरेन्द्र मोदी सरकार ने पोपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) पर लगाम कसने के लिए एक्शन लेना शुरू कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के निर्देश पर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) तथा प्रवर्तन निर्देशालय (ईडी) ने बृहस्पतिवार को 13 राज्यों में पीएफआई के ठिकानों पर छापेमारी की। इस दौरान पीएफआई के राष्ट्रीय अध्यक्ष ओएमए सलाम तथा दिल्ली प्रमुख परवेज अहमद सहित कुल 106 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। जांच एजेंसियों ने केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, बिहार, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, असम, मध्यप्रदेश एवं महाराष्ट्र में छापेमारी की है। पीएफआई पर आतंकियों के लिए वित्तपोषण करने तथा कट्टरपंथी गतिविधियों को बढ़ावा देने का आरोप है। वर्ष 2017 में एनआईए ने पीएफआई पर प्रतिबंध लगाने की मांग की थी, क्योंकि इस संगठन के खिलाफ हिंसक गतिविधियां चलाने एवं आतंकी गतिविधियों में संलग्न होने का आरोप मिला था। एनआईए ने ये भी कहा था कि पीएफआई राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा है। एनआईए और ईडी पिछले कई महीनों से पीएफआई की गतिविधियों पर नजदीकी से नजर रख रही थी। इस संगठन पर धार्मिक कट्टरता को प्रोत्साहन देने तथा जबरन धर्मांतरण में शामिल होने का भी आरोप है। ऐसी खबर है कि पीएफआई को खाड़ी देशों से वित्तीय मदद मिल रही है। एनआईए ने पहले गिरफ्तार पीएफआई के कई कैडरों से पूछताछ की थी जिसमें कुछ सनसनीखेज खुलासे सामने आये थे। एनआईए के अनुसार पीएफआई वर्ष 2047 से पहले ही भारत को इस्लामिक राष्ट्र के रूप में तब्दील करने की योजना पर काम कर रहा था। भारत में हिजाब विवाद के पीछे भी पीएफआई का हाथ माना जा रहा है। इसी वर्ष कर्नाटक में हुए हिजाब विवाद के पीछे पीएफआई का होने का सुरक्षा एजेंसियों को सबूत मिला था। यह संगठन युवाओं को गुमराह कर हिजाब मामले को सांप्रदायिक रंग देकर अपना मकसद पूरा करने की साजिश रच रहा था। कुछ राजनीतिक पार्टियां अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए इसका समर्थन कर रही थीं। पीएफआई इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) का ही बदला हुआ रूप है। वर्ष 2006 में सिमी पर प्रतिबंध लगने के बाद पीएफआई का गठन हुआ। वर्ष 2012 आते-आते इस संगठन पर कई गंभीर आरोप लगे, किंतु राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यह बचता रहा। वास्तव में पीएफआई तीन मुस्लिम संगठनों को मिलाकर बना है। केरल के नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट, कर्नाटक फोरम ऑफ डिग्निटी तथा तमिलनाडु का मिनिथा नीति परसाई नामक तीनों संगठनों का इसमें विलय हुआ है। पीएफआई की छात्र शाखा कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) तथा महिला संगठन नेशनल वुमेन फ्रंट भी इसी का सहायक संगठन है। पीएफआई पर इतनी बड़ी कार्रवाई पहली बार हुई है। केंद्र गृह मंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल तथा केंद्रीय गृह सचिव अजय भल्ला लगातार स्थिति पर नजर रख रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों से पीएफआई की बढ़ती गतिविधियां चिंता का विषय है। वर्ष 2021 तक कर्नाटक  में हिजाब को लेकर कोई विवाद नहीं था, किंतु अचानक इस  पर विवाद बढ़ने से जांच एजेंसियों के कान खड़े हुए हैं। भारत में हिजाब को लेकर आंदोलन चल रहा है, जिसकी सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में हो रही है। कुछ संगठनों द्वारा स्कूलों में हिजाब को पहनने की छूट देने की मांग की जा रही है। दूसरी तरफ इस्लामिक राष्ट्र ईरान जहां शरिया कानून लागू है, वहां की महिलाएं हिजाब के खिलाफ सड़कों पर उतर चुकी हैं। महिलाएं बिना हिजाब के सड़कों पर आकर हिजाब जला रही हैं। स्थिति इतनी विस्फोटक हो गई हैं कि अब महिलाएं ईरान के राष्ट्रीय ध्वज को भी आग के हवाले करने से भी परहेज नहीं कर रही हैं। 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद ही वहां की महिलाओं के लिए हिजाब पहनना अनिवार्य कर दिया गया है। इससे पहले वहां ऐसा कोई नियम नहीं था। सबसे आश्चर्य की बात यह है कि लोकतांत्रिक देश भारत में हिजाब के समर्थन में आंदोलन चल रहा है, जबकि ईरान जैसे इस्लामिक देश में इसका जबर्दस्त विरोध हो रहा है। भारत के राजनेता इस पूरे मामले में अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने से पीछे नहीं हट रहे हैं। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता है। अब जांच पूरी होने के बाद ही यह पता चलेगा कि पीएफआई की गतिविधियां किस हद तक राष्ट्रीय हितों को चुनौती दे रही है।