अभी त्यौहारों का सिजन चल रहा है। ऐसे में खरीदारी करना भी लाजमी है। फिर चाहे वो कपड़े हो,या कुछ और, किंतु आज कल ऑनलाइन का चलन भी एक चरम सीमा पार कर रहा है। जिसे देखो वही ऑनलाइन खरीदारी कर रहा है परंतु हमें एक बात का ध्यान रखना है कि हमारी समाज की जो संरचना है उस संरचना में ये रूप है कि हम किसी से कोई समान लेते हैं तो केवल समान ही नहीं लेते, उसको समान लेकर एक सहयोग भी देते है। इसी तरह जब हम बाजार से सब्जी लेते हैं तो सब्जी वाले को भी फायदा होता है, सब्जी वाला जिससे लेकर आता है उसे भी, और फिर उसके साथ उस किसान का भी हित जुड़ा हुआ है जिस तरह ऑनलाइन का बाजार गर्म है, आनेवाले दिनों में पूरा बाजार के बहुसंख्यक समुदाय पर ऑनलाइन का कबजा हो जाएगा और यदि ऐसा हो जाता है तो सारा व्यापार कुछ घरानों तक सीमित हो जाएगा। इतने सारे दुकानदार, हाथठेलों पर बेचने वाले, यहां तक कि रोजी रोटी कमाने वाले प्रत्येक परिवार बेरोजगार हो जाएगा। इसलिए हमें निजी स्वार्थ से थोड़ा ऊपर जाना चाहिए। ऑनलाइन अगर सामान मंगाना ही है तो उन्हीं वस्तुओं को मंगाए जो बाजार में आसानी से सुलभ न हो, हमारे लिए दो पांच प्रतिशत का अंतर मायने नहीं रखता है। लेकिन इस से कई घरों के लोगों की रोजी रोटी उपलब्ध होगी। इसे हमें अपना योगदान समझना चाहिए, तभी हम अपने देश की इस सामाजिक संरचना को ठीक बना सकेंगे।