तेजपुरः हिंदी दिवस के उपलक्ष्य में हिंदी साहित्य सम्मेलन, तेजपुर द्वारा आयोजित सभा में मुख्य वक्ता के तौर पर बोलते हुए संजीव गोस्वामी ने कहा कि हिंदी आजादी से पहले से ही भारत की संपर्क भाषा रही है। स्वाधीनता संग्रामियों ने आजादी की लड़ाई में हिंदी का उपयोग आपस में संपर्क साधने के लिए किया। प्रवासी भारतीयों द्वारा हिंदी के उपयोग में विदेशी शब्दावलियों का भी हिंदी में  समायोजन होने से हिंदी के नए-नए रूप सामने आ रहे हैं और इसे सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। उक्त सभा में मुख्य अतिथि के रूप में तेजपुर विश्वविद्यालय के डॉ. अनुशब्द ने कहा कि हिंदी भारत की बहुलतावादी संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली भाषा है। यहां सदियों से कई सारी भाषाओं और संस्कृतियों का सौहार्दपूर्ण साहचर्य रहा है और इन सारी भाषाओं के बीच हिंदी ही एक ऐसी भाषा है जिसका अखिल भारतीय स्वरूप है। उन्होंने बताया कि हिंदी एक स्मृद्ध, उन्नत एवं वैज्ञानिक भाषा होने के साथ-साथ रोजगार की दृष्टि से भी हिंदी आज विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में कमतर नहीं है। दरंग महाविद्यालय के पूर्व हिंदी विभाग प्रमुख प्रोफेसर कृष्णाकांत झा ने कहा कि हिंदी की चुनौतियां आज अलंघ्य पहाड़ की तरह दिखाई दे रही है जबकि यह कृत्रिम पहाड़ है, जिसे बहुत सामान्य से प्रयासों से ढहाया जा सकता है। सरकार को सुनियोजित नीति बनानी चाहिए और उसे पूरे मन से लागू करना चाहिए। साथ ही सामाजिक और सांस्कृतिक संगठन हिंदी को विश्व भाषा बनाने में सरकार की बहुत मदद कर सकते हैं। सम्मेलन के सलाहकार नथमल टिबरेवाला ने कहा कि जिस हिंदी भाषा में पूरे देश में स्वतंत्रता संग्राम लड़ा गया, उस हिंदी को देश की सम्मानित भाषा - राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए थी। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए जन-जागरण और आंदोलनबद्ध होकर संकल्प लेकर हमें प्रयास करना होगा। हिंदी राष्ट्रभाषा बने, हिंदी यूएनओ की भाषा अनुसूची में शामिल हो, भारत के सभी संस्थानों में हिंदी का सुचारु रूप से पठन-पाठन हो ऐसा संकल्प लेकर हमें जन-जन में पूरे देश में जन चेतना जागृत करनी होगी। कार्यक्रम में सम्मेलन की सचिव वाणी बरठाकुर, नाजु हथिकाकोती, उषाकिरण टिबरेवाला, सविता दास, संजीव गोस्वामी आदि कवियों ने कविता पाठ किया। सभा की अध्यक्षता नवल किशोर राय व धन्यवाद ज्ञापन नाजु हातिकाकोती ने किया।