2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव को लेकर विपक्षी दल अभी से ही तैयारी में जुट गए हैं। इस चुनाव के लिए मुश्किल डेढ़ वर्ष का समय बचा है। इस बार का लोकसभा चुनाव भाजपा बनाम विपक्ष होने जा रहा है। मोदी के कारवां को रोकने के लिए विपक्षी दलों ने आपस में विचार-विमर्श शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) का दामन छोड़ने  के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार लगातार भाजपा पर हमलावर हैं। दिल्ली का दौरा कर उन्होंने विपक्षी दलों के नेताओं के साथ विचार-विमर्श का दौर शुरू कर दिया है। उन्होंने कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, एनसीपी के नेता शरद पवार, माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी, सपा के अध्यक्ष अखिलेश यादव सहित विभिन्न नेताओं से विपक्षी एकता के मुद्दे पर विचार-विमर्श किया। विपक्ष का मानना है कि अगर सारी विपक्षी पार्टियां एकजुट हो जाएं तो भाजपा को हराया जा सकता है। 545 सदस्यीय लोकसभा में दो सदस्य मनोनीत होते हैं जबकि 543 सीटों के लिए चुनाव होता है। लोकसभा में बहुमत के लिए 272 का आंकड़ा चाहिए। अगर बिहार, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र एवं तेलंगाना की कुल सीटों को जोड़ दिया जाए तब भी यह आंकड़ा 272 तक नहीं पहुंच पाएगा। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकता के बावजूद भाजपा को 80 में से 62 सीटों पर विजय मिली थी। बिहार में कुल 40 सीटों के चुनाव में भाजपा को राष्ट्रीय जनता दल एवं जनता दल (यू) से कड़ी टक्कर मिलेगी। भाजपा ने अभी से ही बिहार में अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए रणनीति के अनुसार पहल शुरू कर दी है। पिछले चुनाव में भी भाजपा ने बिहार में अच्छा प्रदर्शन किया था। पश्चिम बंगाल में कुल 42 सीटों में से भाजपा को 18 सीटों पर विजय मिली थी। उस चुनाव में भी भाजपा ने अपने बल-बूते पर प्रतिद्वंद्विता की थी। महाराष्ट्र में भाजपा को शिव सेना के शिंदे गुट का साथ मिल रहा है। अगर यह साथ बरकरार रहा तो यहां भी भाजपा कांग्रेस, एनसीपी एवं उद्धव गुट पर भारी पड़ेगी। तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव भी विपक्षी एकता के लिए काफी हाथ-पैर मार रहे हैं। तेलंगाना में लोकसभा की कुल 17 सीटें हैं, जिसमें भाजपा ने पिछले चुनाव में चार सीटों पर जीत दर्ज की थी। इस बार भाजपा भी तेलंगाना में पूरी तैयारी के साथ जुटी हुई है। 2023 में कर्नाटक एवं तेलंगाना में चुनाव होने वाले हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा दोनों राज्यों में बेहतर प्रदर्शन कर लोकसभा के लिए नींव तैयार करने में जुटी हुई है। विपक्षी एकता के खतरे को भांपते हुए भाजपा ने देश के 144 लोकसभा क्षेत्र को विशेष रूप से चिन्हित किया है, जहां जीत सुनिश्चित करने के लिए हरसंभव कदम उठाये जा रहे हैं।  इसमें पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, पंजाब एवं तमिलनाडु शामिल हैं। गुजरात एवं हिमाचल प्रदेश का चुनाव भी होने जा रहा है जिसके भाजपा ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। लोकसभा चुनाव से पहले  किसी एक चेहरे पर सहमति बनती नहीं दिख रही है। इसका कारण यह है कि कांग्रेस राहुल गांधी को, आप अरविंद केजरीवाल को तथा टीएमसी ममता बनर्जी को हर हाल में प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार बनाना चाहती है। शरद पवार पहले से ही विराट अनुभव के कारण अपने को प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे योग्य नेता मानते हैं। अगर आपस में सहमति नहीं बनी तो विपक्षी एकता को निश्चित रूप से धक्का लगेगा। कई राज्यों में विपक्षी दल एक-दूसरे के आमने-सामने चुनाव मैदान में उतरेंगे। ऐसी स्थिति में उनके बीच तालमेल बैठाना मुश्किल होगा। मायावती, जगन मोहन रेड्डी, नवीन पटनायक एवं अन्ना द्रमुक के नेता विपक्षी खेमे में जाने से परहेज करेंगे। इसके पीछे राज्य की राजनीति स्थिति मुख्य कारण है। अन्ना द्रमुक एवं द्रमुक, टीएमसी और माकपा, कांग्रेस और बीजू जनता दल, सपा और बसपा की राजनीतिक दुश्मनी जगजाहिर है। दूसरी तरफ भाजपा की तरफ से पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 2024 के लिए भी इस पद के लिए उम्मीदवार होंगे। उनकी स्वच्छ छवि तथा विश्व में बढ़ते रुतबे का मुकाबला करना किसी विपक्षी दल के उम्मीदवार के लिए आसान नहीं होगा। भाजपा की चुनावी रणनीति भी विपक्षी पर भारी पड़ सकती है। ऐसी स्थिति में विपक्षी कुनबे को एकजुट करना नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं होगा। केवल विपक्षी पार्टियों की संयुक्त रैली कर विपक्ष को एकजुट नहीं किया जा सकता। नीतीश कुमार भले ही प्रधानमंत्री पद के लिए अपने को दावेदार नहीं बता रहे हैं, किंतु उनके मन छिपी लालसा जनता दल के बैनर-पोस्टरों से उजागर हो चुकी है। कहीं ऐसा न हो कि प्रधानमंत्री के चक्कर में उनकी पकड़ बिहार की सत्ता पर कमजोर न पड़ जाए। कुल मिलाकर अगला लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प होने जा रहा है।