हिंदी दिवस हिंदी के प्रति अपनी निष्ठा, वचनबद्धता, ममत्व, लगाव एवं भावनात्मक जुड़ाव प्रकट करने के दिवस है। हिंदी के प्रचार-प्रसार, विकास और विस्तार के लिए संकल्प लेने का दिवस है। विश्व भर में हिंदी के प्रति चेतना जागृत करने हिंदी लेखकों, रचनाकर्मियों एवं साहित्यकारों की निष्ठा को सम्मानित करने का दिन है। हिंदी की वर्तमान स्थिति का अवलोकन उसकी प्रगति पर चिंतन-मनन करने का दिवस भी है। अपनी राष्ट्रभाषा के बिना किसी देश की कल्पना नहीं की जा सकती है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कहा था कि राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है। 73 वर्ष पहले 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा के रूप में मान्यता दी गई थी। उसके बाद कई दशक बीत जाने के बावजूद हिंदी को राजभाषा से राष्ट्रभाषा के रूप में तब्दील नहीं किया जा सका। राजभाषा के रूप में विभिन्न सरकारी विभागों में हिंदी के शत-प्रतिशत प्रयोग के बावजूद अभी भी यह लक्ष्य से काफी दूर है। यह अच्छी बात है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा प्रत्येक वर्ष आयोजित अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन पहली बार दिल्ली से बाहर हो रहा है। महात्मा गांधी के गृहराज्य गुजरात के सूरत में 14 एवं 15 सितंबर को राजभाषा सम्मेलन आयोजित हो रहा है। इससे हिंदी के प्रचार-प्रसार में तेजी आएगी। किसी भी राष्ट्र के विकास की बुनियाद उसकी निजी भाषा की संपन्नता में निहित होती है। हमारी निजी संस्कृति, सभ्यता, परंपरा, दर्द एवं व्यथा की मूल चेतना की वास्तविक अभिव्यक्ति निजी भाषा में ही संभव हो सकती है। इसीलिए भाषा हमारे गौरव की पहचान होती है, जिसमें हमारे राष्ट्र का सामूहिक स्वर मुखरित होता है। हिंदी एक समुद्र की तरह है जिसमें स्थानीय भाषाएं आकर मिलती हैं तथा इसको और समृद्ध बनाती हैं। हिंदी अंग्रेजी भाषा का विकल्प हो सकता है, किंतु वह क्षेत्रीय भाषा का विरोधी नहीं है। भारत सरकार की नई शिक्षा नीति में मातृभाषा के प्रयोग पर जोर दिया गया है जिससे क्षेत्रीय भाषाओं में नई ऊर्जा का संचार हुआ है। सरकार की इस नीति से हिंदी एवं स्थानीय भाषाओं के बीच और सहयोग बढ़ेगा। आजादी की लड़ाई के वक्त भी हिंदी के लेखकों एवं कवियों ने दिशाहीन समाज को नई चेतना और नई रोशनी दी। स्वतंत्रता संग्राम की पूर्णाहुति में हिंदी का अवदान अद्वितीय रहा है। हिंदी समाज को तोड़ने का नहीं, बल्कि जोड़ने का काम कर रही है। गैर-हिंदीभाषी कवियों एवं लेखकों ने भी हिंदी के विकास एवं प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। समय बदलने के साथ ही हिंदी का प्रचार-प्रसार भी हुआ है। देश के दूरस्थ अंचलों में बिखरे हुए जन-जन की संपर्क भाषा भी रही है। जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी वे भी भली-भांति बोलते और समझते हैं। दुनिया में अंग्रेजी और मंदारिन भाषा के बाद सबसे ज्यादा हिंदी भाषा बोली जाती है। देश अभी आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। सरकार इस मौके पर कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन कर रही है। लेकिन अफसोस की बात है कि अभी तक हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में मान्यता नहीं मिली है। आजादी के 75 वर्ष बीतने के अवसर पर आज हमें यह संकल्प लेना होगा कि हमें हिंदी को उसके अधिकार को दिलाना है। हिंदी साहित्य किसी भी दृष्टि से अंग्रेजी साहित्य से कम नहीं है। अंग्रेजी की अनिवार्यता के तिलिस्म ने हिंदी को अपने ही घर में अजनबी एवं प्रवासिनी बना दिया है। भारत दुनिया के लिए एक बड़ा बाजार है। विश्व में बढ़ती व्यापारिक स्पर्धा ने दुनिया को हिंदी की तरफ आकर्षित होने के लिए मजबूर कर दिया है। आज विश्व के 150 से अधिक विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई शुरू हुई है। आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों, कंप्यूटर, मोबाइल, आईपैड, वाट्सअप, ट्विटर आदि में हिंदी का प्रयोग बढ़ रहा है। सोशल मीडिया, इंटरनेट और गूगल पर हिंदी लिखने और बोलने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। पूरे देश में हिंदी की स्वीकार्यता व्यापक रूप से बढ़ रही है। गूगल के चेयरमैन ने कहा है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा इंटरनेट बाजार बनने जा रहा है, जिसमें हिंदी की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। इन सबके बावजूद हिंदी को देश में अभी तक वह सम्मान नहीं मिला है जिसका वह हकदार है। हिंदी को और समृद्ध बनाने के लिए विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा तथा न्यायपालिका के क्षेत्र में और काम करने की जरूरत है। इन क्षेत्रों में प्रयोग होने वाले अंग्रेजी शब्दों का हिंदी अनुवाद करना जरूरी है। सरकारी विभागों में केवल हिंदी माह, पखवाड़ा, सप्ताह एवं दिवस मनाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि हर दिन हिंदी के प्रयोग पर जोर देना होगा। जब भारत में हिंदी को उसका सही हक मिलेगा तभी दुनिया में हिंदी का तेजी से प्रसार होगा। हिंदी दिवस के अवसर पर हम सभी को यह संकल्प लेना है कि हम हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सच्चे दिल से काम करेंगे।
हिंदी दिवस
