भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख में तनाव कम करने पर सहमति बनी है। जुलाई में भारत और चीन के बीच कमांडर स्तर के बीच हुई वार्ता के आधार पर अब दोनों देश पूर्वी लद्दाख के गोगरा एवं हॉट स्प्रिंग्स क्षेत्र से अपने-अपने सैनिकों को 12 सितंबर तक वापस बुला लिये हैं। पिछले दो वर्षों से दोनों देशों के बीच इस मुद्दे को लेकर तनातनी चल रही थी। दोनों तरफ से फौज आमने-सामने खड़ी थी जिससे कभी भी युद्ध की चिंगारी भडक़ सकती थी। इससे पहले गलवान घाटी से दोनों देशों ने अपने-अपने सैनिकों को पीछे हटाने के लिए कदम उठाया था। लेकिन इसके बाद चीन गोगरा एवं हॉट स्प्रिंग्स से पीछे हटने को तैयार नहीं था। ऐसी खबर है कि दोनों पक्ष इस क्षेत्र में बने अपने-अपने अस्थायी संरचना को भी हटाएंगे। दोनों ही पक्ष एक-दूसरे के क्षेत्र में जाकर इस बात की जांच करेंगे कि सैनिकों की वापसी एवं अस्थायी संरचना हटाने का काम जमीनी स्तर पर हुआ है या नहीं। दोनों ही पक्ष भविष्य में कोई भी ऐसा एकतरफा कार्रवाई नहीं करेंगे जिससे द्विपक्षीय संबंधों पर विपरीत असर पड़े। आगे भी शेष विवादित मुद्दे पर दोनों पक्ष द्विपक्षीय वार्ता जारी रखने पर भी सहमत हुए हैं। मालूम हो कि देमचुक एवं देपसांग क्षेत्र में असली समस्या है, क्योंकि चीन वहां से हटने को तैयार नहीं है। इन दोनों ही क्षेत्रों में चीन ने सैनिकों की भारी तैनाती कर रखी है तथा कई संरचनाओं का निर्माण किया है ताकि उनके सैनिकों को बेहतर सुविधा मिल सके। चीन हमेशा भारत के पर हावी होने के लिए चाल चलता रहता है। देमचुक और देपसांग सामरिक दृष्टि से भारत के लिए काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसी क्षेत्र से होकर दौलत बेग ओल्डी तक रास्ता पहुंचता है। 18000 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थित भारत का यह हवाई अड्डे सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहां से चीन एवं पाकिस्तान दोनों पर नजर रखी जा सकती है। यहां से पाकिस्तान के सियाचिन ग्लेशियर पर भी नजर रखी जाती है। चीनभारत के इस ऊंचाई वाले हवाई अड्डे पर नजर रखने के लिए देमचुक एवं देपसांग में अपनी पैठ मजबूत बनाना चाहता है। अपनी विस्तारवादी नीति पर आगे बढ़ते हुए चीन अपने पड़ोसी देशों की जमीन को धीरे-धीरे हथियाना चाहता है। इसके लिए वह कहीं कर्जजाल का सहारा लेता है तो कहीं धमकाने से पीछे नहीं हटता। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन की इस नरमी के पीछे उज्बेकिस्तान में होने वाले शांघाई सहयोग संगठन की बैठक है। इस बैठक में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा चीन के राष्ट्रपति शी जिंगपिंग भाग लेने वाले हैं। वहां दोनों नेताओं की बैठक कराने की कोशिश हो रही है। चीन ने मोदी और शी की बैठक को सकारात्मक कराने के लिए नरम रुख अख्तियार किया है। देखना है कि इस बैठक में कोई नतीजा सामने आता है या नहीं। चीन जैसे कुटिल पड़ोसी पर कभी भी विश्वास नहीं किया जा सकता है। एक तरफ चीन पूर्वी लद्दाख में तनाव कम करने का प्रयास कर रहा है तो दूसरी तरफ अरुणाचल प्रदेश सेक्टर में अपनी स्थिति मजबूत कर रहा है। भारत भी इस मामले में पूरी तरह सजग है। अरुणाचल सेक्टर में सेना एलएसी पर अपनी क्षमता बढ़ा रही है। संवेदनशील क्षेत्रों में तैनात अपनी सैनिकों को विशेष प्रशिक्षण दे रही है। सडक़ों, पुलों और गोला-बारूद डिपो के निर्माण से लेकर अपने निगरानी तंत्र को मजबूत बनाने तक सेना एलएसी के पास सैन्य बुनियाद ढाचे के विकास में तेजी ला रही है। उम्मीद है कि वर्तमान पहल से दोनों देशों के संबंधों में आई तल्खी कम होगी, किंतु भारत को चीन की हर चाल पर सजग रहना होगा।
तनाव कम करने पर सहमति
