पितृपक्ष में पितृगणों की प्रसन्नता के लिए उनका श्राद्ध करने की धार्मिक मान्यता है। सनातन धर्म में श्राद्ध की विशेष महिमा है। आश्विन कृष्णपक्ष की प्रतिपदा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तिथि तक पितृपक्ष कहलाता है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि इस बार पितृपक्ष 11 सितंबर, रविवार से प्रारंभ होकर 25 सितंबर, रविवार तक श्राद्ध संबंधित समस्त कृत्य किए जाएंगे। पितरों के निमित्त प्रात:काल स्नान करके तिल, जौ, अक्षत, कुशा एवं गंगाजल सहित संकल्प लेकर पिंडदान व तर्पण किया जाता है। सनातन धर्म में अपने परिवार के दिवंगत प्राणियों का श्रद्धा के साथ श्राद्ध किया जाता है। जिससे भौतिक सुख, समृद्धि, वैभव, यश, सफलता आदि प्राप्त होकर जीवन में सौभाग्य का मार्ग प्रशस्त होता है। पितृपक्ष में प्रत्येक व्यक्ति को अपने दिवंगत माता-पिता एवं अन्य परिजनों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध अवश्य करना चाहिए। जिन्हें अपने परिजनों की मृत्यु तिथि मालूम न हो, उन्हें श्राद्ध पक्ष के अंतिम दिन यानि अमावस्या तिथि यानि सर्व पितृ अमावस्या (पितृ विसर्जन) के दिन श्राद्ध करना चाहिए। लेकिन जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि के दिन हुई हो, उनका श्राद्ध भाद्रपद माह के पूर्णिमा तिथि के दिन करने का नियम है। पूर्णिमा तिथि का श्राद्ध प्रौष्ठïपदी श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। इस बार यह श्राद्ध 10 सितंबर, शनिवार को किया जाएगा। श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं—(1) नित्य, (2) नैमित्तिक, (3) काम्य, (4) वृद्धि, (5) सपिंडन, (6) पार्वण, (7) पार्वण, (8) शुद्ध्यर्थ, (9) कमांग, (10) दैविक, (11) औपचारिक, (12) सांवत्सरिक श्राद्ध आदि। पितृपक्ष में सायंकाल अपने घर के मुख्यद्वार के बाहर दीप प्रज्वलित करके श्रद्धापूर्वक पितृविसर्जन करने का विधान है। विमल जैन ने बताया कि अमावस्या तिथि के दिन परिवार के सभी पितरों के श्राद्ध करने का विधान है। श्राद्ध संबंधित कृत्य मध्याह्नकाल में करना उत्तम रहता है। सूर्यास्त के पश्चात् श्राद्ध संबंधित कोई भी कृत्य नहीं करना चाहिए। श्राद्ध में होने वाले मुख्यरूप से कार्य : पिंडदान, तर्पण व ब्राह्मण भोजन। श्राद्ध में योग्य ब्राह्मणों को घर पर निमंत्रित करके भोजन करवाया जाता है। ब्राह्मण को कराए गए भोजन से पितृगणों को प्रसन्नता होती है। 1, 3 या 5 ब्राह्मणों को भोजन करवाने की मान्यता है। विमल जैन ने बताया कि पितृपक्ष में शुद्ध, सात्विक एवं शाकाहारी भोजन बनाया जाता है। भोजन में लहसुन प्याज का सेवन करना वर्जित है। भोजन में मिष्ठान्न का होना अति आवश्यक है। ब्राह्मण भोजन करवाने के पूर्व गाय, कुत्ता, कौआ, चींटी व देवता के निमित्त पत्ते पर भोजन निकाल कर देना चाहिए, जिसे पंचबलि कर्म कहते हैं।
मो. : 09335414722