चद्रसिंह बिरकाली आधुनिक राजस्थान के सर्वाधिक प्रसिद्ध प्रकृति प्रेमी कवि थे। इनकी सबसे प्रसिद्ध प्रकृति परक रचनाएं ‘लू’, ‘डाफर’ व ‘बादली’ हैं। चंद्रसिंह बिरकाली ने महाकवि कालिदास के कई नाटकों का राजस्थानी में अनुवाद किया था। ‘बादली’ और ‘लू’ उनकी दो महान् काव्य रचनाएं हैं, जिन्होंने सारे देश का ध्यान राजस्थान की ओर आकर्षित किया था। उनका जन्म 24 अगस्त, 1912 में राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील के ‘बिरकाली’ नामक ग्राम में हुआ था। इनका रचना संसार मात्र सात वर्ष की अल्पायु में ही प्रारंभ हो गया था। आधुनिक राजस्थानी साहित्य के अग्रणी रचनाकार चंद्रसिंह बिरकाली ‘लू’ व ‘बादली’ जैसी काव्य कृतियों के कारण कवि रूप में जाने जाते थे। चंद्रसिंह जी ने कुछ कहानियां भी लिखीं, जिनमें लोक-जीवन की अलग-अलग रूपों में अभिव्यक्ति हुई है। जूनी राजस्थानी साहित्य की रचना में प्रकृति काव्य की एक अच्छी परंपरा है, लेकिन आधुनिक काल में इसकी शुरुआत चंद्रसिंह जी की ‘बादली’ से शुरू हुई। ‘बादली’ 1941 में छपी थी। इसमें 130 दोहे हैं। इसके दोहे मरुभूमि की वरसाला ऋतु की प्राकृतिक छठा का विवेचन करते हैं। कवि ने बरसात से पहले की स्थिति का वर्णन ‘बादली’ में किया है। ऐसे ही 1955 में छपी ‘लू’ में 104 दोहे हैं। ‘लू’ में लू का बनाव शृंगार योग है। कवि राजस्थान का वासी है, इसलिए उन्हें इस बात का ध्यान है। महान् साहित्यकारों सुमित्रानंदन पंत, महादेवी वर्मा और सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने ‘बादली’ पर अपनी सम्मतिया दीं और उसे एक अनमोल रचना बतलाया। साहित्यकारों रवींद्रनाथ ठाकुर, मदनमोहन मालवीय आदि ने भी चंद्रसिंह बिरकाली को श्रेष्ठ रचनाकार के रूप में स्वीकार किया था।