आत्मनिर्भर भारत मिशन के तहत प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्वदेश निर्मित विमान वाहक पोत आईएनएस विक्रांत का जलावतरण करके समुद्र में भारत का दबदबा बढ़ाने की ओर कदम बढ़ा दिया है। आईएनएस विक्रांत के जलावतरण के साथ ही भारत विश्व के उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, खुद अपने बल पर विमान वाहक पोत तैयार करने की क्षमता रखता है। भारत के अलावा अमरीका, चीन, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन एवं जर्मनी के पास ऐसी क्षमता है। विक्रांत के साथ-साथ भारत ने छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित नौसेना के नए निशान (ध्वज) का भी अनावरण किया गया। इसके साथ ही भारत गुलामी के निशान सेंट जॉर्ज क्रॉस को हटाकर अपना ध्वज लहरा दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस मौके पर कहा कि आज भारतीय नौसेना ब्रिटिश के गुलामी वाले निशान से आजाद हो गई है। 45 हजार टन वजनी विक्रांत का निर्माण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड में तैयार किया गया है, जिसको बनाने में करीब 13 वर्ष लगे हैं। 1971 के भारत-पाक युद्ध में विक्रांत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। भारत ने अपने पुराने विमान वाहक पोत को स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल कर फिर से नए रूप में तैयार किया है, जो काबिलेतारीफ है। यह पोत 262 मीटर लंबा और 60 मीटर चौड़ा है, जो फुटबॉल मैदान के बराबर है। 76 फीसदी स्वदेशी उपकरणों से तैयार इस युद्धपोत की स्ट्राइक फोर्स की रेंज 1500 किलोमीटर है। इस पर मिग-29के, कामोव-31 सहित अन्य लड़ाकू विमान एवं हेलिकॉप्टर तैनात रहेंगे। इस पोत पर 36 से 40 लड़ाकू विमान एक साथ तैनात हो सकते हैं। 20 हजार करोड़ की लागत से निर्मित यह युद्धपोत 21वीं सदी में भारत के परिश्रम, प्रतिभा, प्रभाव एवं प्रतिबद्धता का प्रमाण है। पिछले वर्ष 21 अगस्त, 21 अक्तूबर तथा इस वर्ष 22 जनवरी एवं मई में इसका ट्रायल सफलतापूर्वक संपन्न किया गया। चीन के साथ बढ़ते तनाव के बीच विक्रांत के जलावतरण के बाद समुद्र में भारत की सामरिक शक्ति काफी बढ़ गई है। अभी चीन के पास भी दो युद्धपोत हैं। विक्रांत के आने से हिंद महासागर में भारत का दबदबा बढ़ जाएगा। भारत के पास आईएनएस विक्रमादित्य पहले से ही मौजूद है। चीन जिस तरह अपनी नौसेना को लगातार मजबूत बनाकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत को घेरने का प्रयास कर रहा है, उसको देखते हुए भारत को भी अपनी सामरिक शक्ति मजबूत करनी होगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जलावतरण के बाद कहा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र और हिंद महासागर में सुरक्षा चिंताओं को लंबे समय तक नजरअंदाज किया गया है। आज ये क्षेत्र हमारे लिए देश की बड़ी रक्षा प्राथमिकता है। इसीलिए भारत नौसेना के लिए बजट बढ़ाने से लेकर उसकी क्षमता बढ़ाने तक हर दिशा में काम कर रहा है। मालूम हो कि लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक भारत-चीन सीमा पर तनाव बना हुआ है। दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के सामने खड़ी हैं। चीन हिंद महासागर में भारत को घेरने के लिए लगातार साजिश रच रहा है। हाल ही में श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर उन्नत उपकरणों से लैस चीन का जासूसी जहाज लगभग एक सप्ताह तक रुका रहा, ताकि वह दक्षिण भारत के सामरिक एवं परमाणु संस्थानों का रेकी कर सके। इसके अलावा चीन श्रीलंका, पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यामां एवं मालदीव के रास्ते भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है। बढ़ती चुनौती को देखते हुए भारत को भी अपनी नौसेना को मजबूत करने तथा उन्नत साजोसामान से से लैस करने की जरूरत है। भारत हिंद महासागर से लेकर दक्षिण एवं पूर्वी चीन सागर तक चीन को जवाब देने के लिए अमरीका, जापान एवं आस्ट्रेलिया जैसे मित्र देशों के साथ मिलकर काम कर रहा है। चीन को माकूल जवाब देने के लिए भारत को अपनी नौसेना को और शक्तिशाली बनाना होगा।
समुद्र में भारत का डंका
