असम विधानसभा चुनाव-2021 समाप्त हो चुका है। इसके बाद अब सबकी नजर दो मई को होने वाली मतगणना पर है। वैसे चुनाव के उपरांत सत्ताधारी भाजपा और मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस दोनों अपने-अपने गठबंधन की जीत का दावा कर रहे हैं,परंतु यह अलग बात है कि दोनों गठबंधन अपनी-अपनी जीत के प्रति मन ही मन सशंकित भी हैं। ऐसे में भाजपा के कार्यकर्ता और नेता दबी जुबां से यह कहते सुने जा रहे हैं कि यदि कांग्रेस महागठबंधन को बहुमत मिल भी जाएगा तो उनके कथित संकटमोचक डॉ.हिमंत विश्वशर्मा भाजपा सरकार बनाने में सफल होंगे तो दूसरी ओर दिल्ली से लेकर दिसपुर तक के कांग्रेसियों की उम्मीद छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल पर टिकी हुई है,जिन्हें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआईसीसी)ने असम चुनाव का मुख्य पर्यवेक्षक बनाया था और असम चुनाव के लिए बघेल ने अधिकांश फैसले लिए और यहां रहकर पूरे अभियान में कांग्रेस को सिर्फ मुकाबले में ही खड़ा नहीं किया,बल्कि तांबुल की दुकान से लेकर सचिवालय में कार्यरत लोगों को भी यह कहने को मजबूर कर दिया है कि इस चुनाव में कांग्रेस ने उम्मीद से बेहतर किया। ऐसे में यदि वह सरकार बना भी ले तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। ऐसे में यह चुनाव सिर्फ कांग्रेस या भाजपा के लिए सरकार बनाने के लिए रास्ता ही तय नहीं करेगा,बल्कि यह हिमंत और बघेल के चुनावी प्रबंधन और रणनीति का परिचायक भी बनेगा। राजनीति के जानकार बताते हैं कि चुनाव की दशा और दिशा बदलने में कांग्रेस की पांच गारंटियों की अहम भूमिका रही। दूसरी ओर कहा जा रहा कि कांग्रेस और एआईयूडीएफ के एक साथ आने से महागठबंधन को पिछली बार भाजपा की ओर से जीती गई करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर बढ़त मिलने की उम्मीद है,परंतु इन जानकारों की नजर से वामदलों और बीपीएफ के साथ आने से कांग्रेस उम्मीदवारों को करीब और डेढ़ दर्जन सीटों पर फायदा मिल सकती है,जो प्रथम चरण के चुनाव परिणाम को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता रखते है। बता दें कि बघेल ने प्रथम चरण की 47 सीटों पर विशेष रूप से अपना ध्यान केंद्रित किया। खासतौर पर उन्होंने चाय बागानों में कार्यरत छत्तीसगढ़,ओडिसा और झारखंड मूल के श्रमिकों पर अपना ध्यान विशेष रुप से केंद्रित किया और करीब एक पखवाड़े से ज्यादा दिनों तक ऊपरी असम की सीटों पर जमे रहे। मतदाताओं को लुभाने के लिए छत्तीसगढ़,ओड़िसा और झारखंड के कलाकारों को बुलाकर उन्हें आकर्षित किया गया। दूसरी ओर हिमंत विश्वशर्मा का पूरा चुनाव अभियान मुगल,मियां, दाढ़ी, टोपी और मियां म्युजियम पर टिकी रही। प्रधानमंत्री, केंद्रीय गृहमंत्री और हिमंत का पूरा चुनाव अभियान भी इन्हीं मुद्दाओं के इर्द-गिर्द घूमता रहा। दूसरी ओर कांग्रेस खाटी असमिया मतदाताओं को लुभाने के लिए नागरिकता संशोधन (सीएए) को न मानने, एनआरसी में सभी भारतीय के नाम होने और भाजपा सरकार की ओर से दफा-6 को लागू न करने को लेकर चलाया गया। ऐसे में मतदाताओं ने कांग्रेस या भाजपा किसके अभियान को स्वीकार किया, इसका फैसला तो दो मई को होगा, परंतु हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि पूरा चुनावी अभियान हिमंत और बघेल के प्रबंधन और रणनीति के तहत चला और इसमें किसको सफलता मिली, इसका फैसला भी दो मई को होने वाली मतगणना से जाएगा, जो दोनों नेताओं के राजनीतिक भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं।
हिमंत या बघेल : बड़ा रणनीतिकार कौन?
