देश के अन्य राज्यों की तरह असम में भी जानलेवा कोरोना वायरस फिर से पांव पसारने लगा है तथा मौत का सिलसिला भी शुरू हो गया है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए राज्य प्रशासन फिर से हरकत में आ गया है। हालांकि राज्य के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा अभी भी दावा कर रहे हैं कि राज्य में कोरोना संक्रमण की स्थिति गंभीर नहीं है। सरकार लॉकडाउन या नाइट कर्फ्यू देने पर कोई विचार नहीं कर रही है। अब सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि कोरोना के मुद्दे पर दोहरा माप दंड क्यों अपनाया जा रहा है? राजनेताओं के लिए अलग तथा दूसरे नागरिकों के लिए अलग पैमाना क्यों है? जिन राज्यों में चुनावी प्रक्रिया चल रही है,वहां कोरोना का कोई खतरा नहीं है। राजनेता बड़ी-बड़ी चुनावी रैलियां कर रहे हैं, जिसमें हजारों की भीड़ बिना मास्क इकट्ठा हो रही हैं। इस भीड़ में विभिन्न पार्टियों के नेता सुपर स्टार की तरह भीड़ को संबोधित करते दिखाई दे रहे हैं। असम भी इससे अछूता नहीं है। असम में हुए चुनाव प्रचार के दौरान भारी भीड़ जुटी तथा बिना मास्क के लोग इकट्ठे हुए। असम में भी कोरोना प्रोटोकॉल की सरेआम धज्जियां उड़ीं। चाहे वह सभा प्रधानमंत्री की हो,कांग्रेसी नेता राहुल गांधी की हो या किसी अन्य राजनेताओं की। असम की तरह ही केरल, तमिलनाडु एवं पुडुचेरी में भी इसी तरह की स्थिति देखने को मिली। बाकी सभी जगहों पर प्रचार खत्म हो चुका है, लेकिन पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान भी उसी तरह की भीड़ जुट रही है। अब असम में जैसे ही तीन चरणों का मतदान 6 अप्रैल को खत्म हुआ है, उसके बाद कोरोना संक्रमण के मामले सामने आने लगे हैं। डिब्रूगढ़, तिनसुकिया, जोरहाट के स्कूलों में एक साथ कई बच्चे कोविड-19 से संक्रमित पाए गए हैं। आम लोगों में यह धारणा बनी है कि चुनाव प्रचार के दौरान काफी भीड़ इकट्ठा होने से कोविड-19 का संक्रमण बढ़ा है। ऐसे में सरकार के समक्ष परेशानी बढ़ना स्वाभाविक है। मजबूर होकर अपनी छवि बचाने के लिए असम सरकार ने कुछ दिशा-निर्देश के साथ बिहू बनाने की अनुमति दी है। इसके लिए राज्य सरकार एक मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसके तहत कार्यक्रमों के आयोजन के लिए जिला प्रशासन से अनुमति लेने, कार्यक्रम से तीन दिन पहले समिति के सदस्यों तथा स्वयंसेवकों की कोरोना जांच अनिवार्य करने तथा कार्यक्रम को रात 11 बजे तक खत्म करने की बात शामिल की गई है। समिति को जिला प्रशासन को यह भी बताना होगा कि बिहू कार्यक्रम में कितने लोग भाग लेंगे। अब तो बाहर से आने वाले यात्रियों की  हवाई अड्डे तथा रेलवे स्टेशनों पर फिर से जांच की जा रही है। प्रश्न यह उठता है कि चुनाव प्रचार के दौरान राजनेताओं के लिए चुनाव आयोग द्वारा दिशा-निर्देश क्यों जारी नहीं किया गया? चुनाव प्रचार के दौरान फैले कोरोना संक्रमण के लिए कौन जिम्मेदार है? इसका जवाब असम की जनता जरूर चाहेगी। कोरोना के मामले में लापरवाही से देश संकट में फंस सकता है। अब असम में कोविड-19 से मरीजों की संख्या लगातार बढ़ने लगी है। कामरूप (मेट्रो) जिला प्रशासन की ओर से शनिवार से अगले तीन दिन तक सरकारी तथा प्राइवेट सभी कार्यालय में कोविड-19 की जांच की जाएगी। कोरोना की दूसरी लहर को देखते हुए अब सतर्कता बरतने की जरुरत है। मास्क लगाने तथा सामाजिक दूरी का पालन बेहद जरूरी है। जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा। चुनावी रैलियों में जाने वालों को भी अपनी जिंदगी की चिंता करनी होगी। राजनेताओं को भी केवल चुनाव जीतने की चिंता नहीं करनी चाहिए, बल्कि समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का भी ख्याल रखना होगा।