बिहार में महागठबंधन के साथ दूसरी बार बनी नीतीश कुमार की सरकार के 33 मंत्रियों में से 23 दागी हैं। इनके खिलाफ अदालतों में मुकदमे चल रहे हैं। बिहार मंत्री परिषद के विस्तार के बाद एडीआर और बिहार इलेक्शन वॉच ने मुख्यमंत्री समेत 33 में से 32 मंत्रियों द्वारा 2020 विधानसभा चुनाव के दौरान दाखिल एफिडेविट का विश्लेषण किया है। एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक जेड(यू) के नेता और कैबिनेट मंत्री अशोक चौधरी को अपना एफिडेविट जमा करने की जरूरत नहीं है क्योंकि वह विधान परिषद के मनोनीत सदस्य हैं, इसलिए आपराधिक, वित्तीय और अन्य विवरणों संबंधी उनकी जानकारी सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक 23 मंत्रियों (72 फीसदी) ने अपने खिलाफ आपराधिक मामले घोषित किए हैं जबकि 17 मंत्रियों (53 फीसदी) ने अपने खिलाफ गंभीर आपराधिक मामले घोषित किए हैं। वहीं, 32 मंत्रियों में से 27 (84 फीसदी) करोड़पति हैं। इसके मुताबिक, सर्वाधिक संपत्ति वाले मंत्री समीर कुमार महासेठ हैं जो मधुबनी सीट का प्रतिनिधित्व करते हैं। समीर की संपत्ति 24.45 करोड़ रुपए की है। वहीं,सबसे कम संपत्ति वाले मंत्री मुरारी प्रसाद गौतम हैं, जिनकी संपत्ति 17.66 लाख रुपए की है। एडीआर के मुताबिक, 8 मंत्रियों (25 प्रतिशत) ने अपनी शैक्षणिक योग्यता 8वीं से 12वीं कक्षा के बीच जबकि 24 मंत्रियों (75 प्रतिशत) ने ग्रेजुएशन या उससे ऊपर की शैक्षणिक योग्यता घोषित की है। वहीं,सीएम नीतीश ने कार्तिकेय सिंह को राज्य के कानून विभाग की जिम्मेदारी सौंपी है। अब आरोप यह लग रहा है कि नीतीश कुमार ने एक वांटेड को कानून मंत्री बना दिया है। दरअसल बिहार के नए कानून मंत्री पर बेहद चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। कानून मंत्री कार्तिकेय सिंह को अपहरण के एक केस में दानापुर कोर्ट में सरेंडर करना था लेकिन कार्तिकेय सिंह शपथ लेने राज भवन पहुंच गए। वहीं कार्तिकेय सिंह ने कहा है कि उनके खिलाफ कोई वारंट नहीं है। उन्होंने एफिडेविट में सारी जानकारी दी है। आरजेडी के कोटे से कानून मंत्री बनाए गए कार्तिकेय सिंह उर्फ कार्तिक मास्टर विधान परिषद के सदस्य (एमएलसी) हैं। हालांकि,उन्हें किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का कहना है कि उन्हें इस मामले की कोई जानकारी नहीं है। आरजेडी एमएलसी कार्तिकेय सिंह बिहार के बाहुबली विधायक रहे अनंत सिंह के काफी करीबी और उनके रणनीतिकार माने जाते हैं। वे पहले एक प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक थे। अनंत सिंह के संपर्क में आने के बाद उन्होंने नौकरी छोड़ दी। जिस मामले में कार्तिक के खिलाफ वारंट निकला है, वह मामला 2014 का है। उन पर बाहुबली अनंत सिंह के साथ मिलकर राजधानी पटना के राजू नामक बिल्डर को अगवा करने का आरोप है। इस मामले में विधि मंत्री कार्तिकेय सिंह का कहना है कि दानापुर की एक अदालत ने उन्हें एक सितंबर तक के लिए राहत दे दी है। उन्होंने अपने खिलाफ सारे मामले को राजनीति से प्रेरित बताया है। 10 अगस्त को महागठबंधन की सरकार बनी। 12 तारीख को कोर्ट ने उन्हें एक सितंबर तक के लिए राहत दी और 16 को उन्होंने मंत्री पद की शपथ ले ली। यह कहीं से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। उनके खिलाफ एक महीने पहले वारंट निकला था। जाहिर है कि न्यायिक प्रक्रिया के तहत उन्हें आत्मसमर्पण करना था। भले ही उन्हें एक सितंबर तक के लिए राहत मिल गई है, लेकिन उसके बाद उन्हें सरेंडर तो करना ही होगा। आरोप के सिद्ध या खारिज होने में समय तो लगता है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नीतीश मंत्रिमंडल में सिर्फ पहली बार दागियों को मंत्री नहीं बनाया गया है,इसके पहले भी केंद्रीय मंत्रिमंडल से लेकर विभिन्न राज्यों के मंत्रिमंडल में दागी शामिल होते रहे हैं तो सवाल है कि इस सवाल को सिर्फ इस बार जोर-शोर के साथ क्यों उठाया जा रहा है? यदि वास्तव में राजनीतिक पवित्रता लानी है तो सभी राजनीतिक दलों को मिल-जुलकर काम करना होगा तभी समस्या का समाधान होगा।
दागी मंत्रियों का मुद्दा
