लंबे अंतराल के बाद भाजपा संसदीय बोर्ड में बदलाव किए गए हैं। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के नेतृत्व में 11 सदस्यीय संसदीय बोर्ड का गठन किया गया है, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह सहित कुल 11 नेता शामिल किए गए हैं। बोर्ड में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा, केंद्रीय जहाजरानी एवं आयुष मंत्री सर्वानंद सोनोवाल, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष के लक्ष्मण, पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्यनारायण जटिया, पूर्व सांसद सुधा यादव, अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष इकबाल सिंह लालपुरा एवं पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव बीएल संतोष को शामिल किया गया है। पूर्वोत्तर से पहली बार किसी भाजपा नेता को संसदीय बोर्ड में जगह मिली है। संसदीय बोर्ड भाजपा की शीर्ष इकाई है जो नीति निर्धारण करने के साथ-साथ चुनाव में उम्मीदवारों के चयन पर अंतिम मुहर लगाती है। सर्वानंद सोनोवाल के लिए संसदीय बोर्ड में शामिल होना उनके तथा पूर्वोत्तर के लिए बड़ी उपलब्धि है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गुड बुक में रहने का उनको ईनाम मिली है। दूसरी बात असम के मुख्यमंत्री बनने से वंचित होने के बाद उनके राजनीतिक जीवन के बारे में कई तरह के सवाल उठने लगे थे, लेकिन भाजपा हाई कमान ने उनका कद काफी ऊंचा कर दिया है। भाजपा हाई कमान ने संसदीय बोर्ड के गठन के मामले में आगामी लोकसभा चुनाव को पूरी तरह ध्यान में रखा है। येदियुरप्पा, के लक्ष्मण को शामिल कर भाजपा ने दक्षिण भारत पर अपना ध्यान फोकस करने का संकेत दिया है। इसी तरह सर्वानंद सोनोवाल को शामिल कर भाजपा ने पूर्वोत्तर में अपनी पकड़ और मजबूत करने पर बल दिया है। सत्यनारायण जटिया को शामिल कर भाजपा ने दलित वर्ग के बीच सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की है। सुधा यादव को शामिल कर पार्टी ने महिला मतदाताओं के बीच यह संदेश देने का प्रयास किया है कि पार्टी उनके हितों का पूरा ख्याल रखती है। इकबाल सिंह लालपुरा को शामिल कर पार्टी ने सिखों और किसान मतदाताओं के बीच उपजी नाराजगी को कम करने का प्रयास किया है। संसदीय बोर्ड के नेताओं पर नजर डालने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपना वर्चस्व कायम रखा है। केंद्रीय परिवहन मंत्री नितिन गडकरी एवं मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड से बाहर निकालना निश्चित रूप से पार्टी में चर्चा का विषय है। इस बार पार्टी ने यह निर्णय लिया है कि भाजपा के किसी भी मुख्यमंत्री को संसदीय बोर्ड में नहीं रखा जाएगा। इसी दिशा-निर्देश के तहत शिवराज सिंह चौहान को संसदीय बोर्ड से हटाया गया है। पार्टी की इसी नियमावली के तहत उत्तर प्रदेश के दबंग मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एवं असम के मुख्यमंत्री हिमंत विश्वशर्मा के नामों पर कोई विचार नहीं हुआ। पहले ऐसा अनुमान था कि शायद योगी को संसदीय बोर्ड में शामिल कर उनका कद बढ़ाया जा सकता है। नितिन गडकरी के हटाये जाने के पीछे उनके हाल के बयानों को जिम्मेदार माना जा रहा है। गडकरी ने हाल ही में कहा था कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए विपक्ष का मजबूत होना आवश्यक है। एक बार उन्होंने यह भी कहा था कि वर्तमान राजनीति से मेरा मन टूट गया है। ऐसा लगता है कि भाजपा खासकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को उनका यह कथन नागवार गुजरा है। भाजपा ने इसके साथ ही राष्ट्रीय चुनाव समिति का भी गठन किया है, जिसमें संसदीय बोर्ड के सभी सदस्यों के साथ-साथ केंद्रीय मंत्री भूपेन्द्र यादव, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस, वरिष्ठ भाजपा नेता ओम माथुर एवं महिला मोर्चा की अध्यक्ष वंथी श्रीनिवासनी को शामिल किया गया है। संसदीय बोर्ड में जहां 11 सदस्य हैं वहीं चुनाव समिति में कुल 15 सदस्यों को रखा गया है। वर्ष 2014 के बाद पहली बार भाजपा के इन दोनों संगठनों में परिवर्तन किया गया है। अब देखना है कि नए संसदीय बोर्ड के गठन के बाद पार्टी का प्रदर्शन कैसा रहता है। सबकी नजर गडकरी के अगले कदम पर लगी हुई है।
भाजपा संसदीय बोर्ड में बदलाव
