महागठबंधन से हाथ मिलाने के बाद नीतीश कुमार ने 10 अगस्त को फिर से बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली। राज्यपाल फागू चौहान ने नीतीश कुमार एवं उपमुख्यमंत्री के रूप में तेजस्वी यादव को पद एवं गोपनीयता की शपथ दिलायी। मंत्रियों के बारे में अभी तक सहमति नहीं बनने के कारण उनके शपथग्रहण को टाल दिया गया है। महागठबंधन में जदयू के अलावा राष्ट्रीय जनता दल (राजद), कांग्रेस, माकपा, भाकपा, भाकपा(माले), हिंदुस्तानी अवाम पार्टी (हम) शामिल हैं। अब मुख्यमंत्री नीतीश के सामने अपने सभी सहयोगी दलों को संतुष्ट करने की बड़ी चुनौती होगी। राजद बड़े विभागों के अलावा गृह मंत्रालय एवं विधानसभा अध्यक्ष पद के लिए मांग कर रहा है। ऐसी खबर है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार किसी भी कीमत पर गृह मंत्रालय छोड़ना नहीं चाहते क्योंकि यह महत्वपूर्ण मंत्रालय है। ऐसी स्थिति में राजद को विधानसभा अध्यक्ष का पद देना ही पड़ेगा। नीतीश कुमार राजद एवं उनके सहयोगी दलों को वो सभी मंत्रालय देने पर सहमत हो गए हैं जो पहले भाजपा के पास था। हम जैसी छोटी पार्टियां भी मंत्रिमंडल में दो सदस्यों को शामिल करने की मांग कर रही है। आगे भी नीतीश कुमार के लिए रास्ता आसान नहीं रहेगा। कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर भी सरकार को मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा, क्योंकि महागठबंधन की सरकार बनने के बाद राजद के कार्यकर्ता अनियंत्रित हो सकते हैं। राजद के सामने अब अपने चुनावी वादे को पूरा करने की चुनौती होगी। बेरोजगारी के बारे में तेजस्वी यादव ने चुनाव से पहले जो लंबे-चौड़े वादे किए थे वो पूरा करना पड़ेगा। केंद्र में भाजपा की सरकार होने के कारण अब बिहार सरकार को विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष करना पड़ेगा। नई सरकार के गठन के साथ ही भाजपा आक्रामक मुद्रा में आ गई है। विश्वासघात के आरोप में भाजपा ने बुधवार को बिहार में जोरदार प्रदर्शन किया है। आगे बिहार में अब शह और मात के नए-नए सियासी दांव देखने को मिलेंगे। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार वर्ष 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव में विपक्ष की तरफ से पीएम पद के उम्मीदवार बनने का सपना देख रहे हैं। उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद कहा है कि उनके आने से विपक्ष मजबूत हुआ है। अब विपक्ष 2024 में प्रधानमंत्री मोदी को टक्कर दे पाएगा। लेकिन नीतीश का रास्ता इतना सुगम नहीं है क्योंकि कांग्रेस राहुल गांधी को छोड़कर किसी दूसरे दल नेता को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकती। शरद पवार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल एवं के चन्द्रशेखर राव भी इस दौड़ में हैं। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के सामने रास्ता आसान नहीं होगा। महागठबंधन की सभी पार्टियों को 2024 तक एकजुट रखना भी उनके लिए आसान नहीं होगा, क्योंकि भाजपा भी चुपचाप बैठने वाली नहीं है। जदयू के पूर्व अध्यक्ष आरसीपी सिंह को मोहरा बनाकर भाजपा जदयू में तोड़फोड़ कराने की कोशिश करेगी। लोकप्रियता में आई कमी का खामियाजा नीतीश को अगले चुनाव में उठाना पड़ सकता है।
नीतीश के सामने चुनौती
