आखिरकार बिहार में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) तथा जदयू के बीच चल रहा गठबंधन टूट गया। पिछले कुछ महीनों से दोनों पार्टियों के बीच खींचतान एवं तनाव चल रहा था। कई मौकों पर दोनों पार्टियों के नेता एक-दूसरे पर हमलावर हो रहे थे। महाराष्ट्र की घटना ने जदयू को सोचने पर मजबूर कर दिया कि वह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में बरकरार रहे या नहीं। मालूम हो कि महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व शिवसेना ने बगावत कर भाजपा से हाथ मिलाकर सरकार का गठन कर लिया है। जदयू को ऐसी आशंका थी कि भाजपा पूर्व केंद्रीय इस्पात मंत्री आरसीपी सिंह के द्वारा जदयू में बगावत करवा सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह को राज्यसभा का टिकट न देकर यह संकेत दे दिया कि अब उनका केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहना संभव नहीं है। कुछ दिन पहले ही जदयू जिस तरह आरसीपी सिंह पर हमलावर रही है उससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहा था कि जदयू कोई बड़ा फैसला लेने वाली है। सोनिया गांधी से नीतीश कुमार की बातचीत तथा राष्ट्रीय जनता से बढ़ी नजदीकी यह बता रही थी कि बिहार में कुछ बड़ा होने वाला है। पिछले महीने के अंत में बिहार में भाजपा नेताओं की बैठक के बाद स्थिति और तनावपूर्ण हो गई। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने 13 जुलाई को अपने पार्टी नेताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि अब देश में क्षेत्रीय पार्टियों का अस्तित्व खत्म हो रहा है। जो क्षेत्रीय पार्टियां बची हैं वो भी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाएगी। उन्होंने यह भी कहा था कि भाजपा परिवारवाद एवं वंशवाद के खिलाफ लड़ रही है। नड्डा के इस संबोधन को लेकर जदयू और ज्यादा सतर्क हो गई क्योंकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह एवं जेपी नड्डा ने भाजपा कार्यकर्ताओं के लिए अगले विधानसभा चुनाव में 200  से ज्यादा सीटों पर प्रतिद्वंद्विता करने के लिए कमर कसने का आह्वान किया था। इसके जवाब में जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष ललन सिंह ने कहा था कि भाजपा को सभी 243 सीटों पर प्रतिद्वंद्विता करने के लिए तैयारी करनी चाहिए। आज सुबह से ही पटना में राजनीतिक गहमागहमी तेज रही। भाजपा, जदयू, राजद एवं कांग्रेस की अलग-अलग बैठक हुई, जिसमें अंतिम रणनीति पर मुहर लगी। नीतीश कुमार ने राज्यपाल से भेंटकर अपना इस्तीफा सौंप दिया है तथा अगली सरकार बनाने के लिए दावा भी पेश किया है। महागठबंधन ने नीतीश कुमार को सर्वसम्मति से विधायक दल का नेता चुन लिया है। नीतीश कुमार के भाजपा का साथ छोडऩे के बाद राजद, कांग्रेस, वामपंथी दल, हिंदुस्तानी अवाम पार्टी आदि ने इस सरकार को समर्थन दिया है। 243 सदस्यीय बिहार विधानसभा ने बहुमत के लिए 122 सदस्यों का समर्थन जरूरी है, जबकि नीतीश कुमार को 164 सदस्यों का समर्थन प्राप्त हो गया है। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार बनने का रास्ता साफ हो गया है। ऐसी खबर है कि पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव फिर से उपमुख्यमंत्री होंगे। ऐसा अनुमान लगाया जा रहा है कि लोकसभा चुनाव नजदीक आने के साथ नीतीश कुमार इस्तीफा देकर प्रधानमंत्री पद के लिए विपक्ष के उम्मीदवार हो सकते हैं। इस पूरे प्रकरण में भाजपा को करारा झटका लगा है। अब अगला लोकसभा चुनाव भाजपा को अपने दम पर  लडऩा होगा। इसके लिए पार्टी को अभी से ही बूथ स्तर से लेकर राज्य स्तर तक कड़ी मेहनत करनी होगी। पाला बदलने के लिए विख्यात नीतीश कुमार कब तक महागठबंधन में रहेंगे इस पर भी प्रश्नचिन्ह लगा हुआ है। पिछले विधानसभा चुनाव में बड़ी पार्टी होने के कारण भाजपा जदयू पर बढ़ती चाहती थी, किंतु नीतीश के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा था। नीतीश कुमार भी मंत्रियों के चयन आदि मुद्दे पर भाजपा के दबाव के कारण मन माफिक फैसला नहीं ले पा रहे थे। सुशील मोदी के मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद नीतीश कुमार को कई मौकों पर परेशानी हुई थी। भाजपा नीतीश कुमार को किनारे करना चाहती थी, किंतु उसके पास कोई विकल्प नहीं था। आरसीपी सिंह के मंत्रिमंडल से बाहर होने के बाद भाजपा और जदयू में और तनाव बढ़ गया था, जिसका परिणाम बिखराव के रूप में सामने आया। अब सबकी नजर भाजपा के अगले कदम पर है।