प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ विपक्षी दलों ने एकजुटता दिखाने के लिए कई बार बैठक की किंतु उसका कोई ठोस नतीजा अब तक सामने नहीं आया है। बैठकों में लिये गए निर्णय को अमलीजामा पहनाने में विपक्षी दल अब तक विफल रहे हैं। राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव तथा महंगाई और जीएसटी के खिलाफ कांग्रेस के देशव्यापी प्रदर्शन के दौरान विपक्षी दलों को एकता को दिखाने का अच्छा मौका मिला था, किंतु वे इस अवसर का लाभ नहीं उठा सके। राष्ट्रपति चुनाव के वक्त विपक्षी एकता बिखर गई। भाजपा समर्थित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के समर्थन में कई विपक्षी पार्टियां आ गईं। आदिवासी समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाली द्रौपदी मुर्मू के खिलाफ जाने का जोखिम उठाने से कई विपक्षी पार्टियों परहेज किया। उनको डर था अगर वो विपक्ष के उम्मीदवार यशवंत सिन्हा को वोट देंगे तो उनका राजनीतिक नुकसान हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मास्टर स्ट्रोक के सामने विपक्ष चित्त हो गया। इसका नतीजा यह हुआ कि द्रौपदी मुर्मू भारी मतों से जीतकर देश की सर्वोच्च कुर्सी तक पहुंचीं। खुद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि अगर पहले मालूम होता तो वे राजग के उम्मीदवार विचार करती। मालूम हो कि यशवंत सिन्हा राष्ट्रपति चुनाव से पहले  उन्हीं की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के नेता थे। उपराष्ट्रपति चुनाव के वक्त भी  विपक्षी एकता में दरार देखी गई। हालांकि भाजपा के उम्मीदवार जगदीप धनखड़ की जीत निश्चित थी, किंतु यहां भी विपक्षी बंटता नजर आया। वाईएसआर कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी, अन्ना द्रमुक, लोक जनशक्ति पार्टी एवं शिवसेना ने भाजपा उम्मीदवार के पक्ष में मतदान किया था। सबसे महत्वपूर्ण यह है कि उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी तृणमूल कांग्रेस ने मतदान से अलग रहकर एक तरह से भाजपा उम्मीदवार का ही समर्थन कर दिया। तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी का तर्क था कि कांग्रेस ने मार्गरेट अल्वा को अपना उम्मीदवार घोषित करने से पहले उनके साथ राय-मशविरा नहीं की। विपक्षी में फूट की वजह से जगदीप धनखड़ 528 मतों के साथ भारी बहुमत से उपराष्ट्रपति निर्वाचित हुए। मार्गरेट अल्वा को केवल 182 सांसदों का मत मिला। कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी के ईडी के दफ्तर में पहली बार पेशी के वक्त विपक्षी पार्टियों की एक बैठक हुई थी, जिसमें समाजवादी पार्टी, शिवसेना, राष्ट्रीय जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति, माकपा, भाकपा, नेशनल कांफ्रेंस एवं डीएमके पार्टी के नेताओं ने हिस्सा लिया था। इन सभी नेताओं का कहना था कि मोदी सरकार ईडी (प्रवर्तन निदेशालय), सीबीआई तथा दूसरी जांच एजेंसियों का सहारा लेकर विपक्षी नेताओं को धमकाने का प्रयास कर रही है। ईडी विपक्षी एकता के बीच बाधक बना हुआ है। उस मीटिंग में विपक्षी नेताओं ने एकजुटता दिखाई, किंतु  जब कांग्रेस ने महंगाई एवं जीएसटी के मुद्दे पर देशव्यापी प्रदर्शन आयोजित किया उस वक्त अन्य विपक्षी पार्टियों ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया। कांग्रेस ने अपने बलबूते पर देशव्यापी प्रदर्शन किया। इससे सत्ताधारी दल भाजपा का मनोबल निश्चित रूप से बढ़ेगा। विपक्ष के कई नेता ईडी एवं दूसरी जांच एजेंसियों के शिकंजे में है। पश्चिम बंगाल के  पूर्व उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री पार्थ चक्रवर्ती शिक्षक भर्ती घोटाले के आरोप में जेल में हैं। इसी तरह आम आदमी पार्टी के पूर्व मंत्री सत्येन्द्र जैन, राष्ट्रवादी कांग्रेस के अजित पवार एवं नवाब मलिक भी ईडी के शिकंजे में है। मनि लांड्रिंग केस में नेशनल कांफ्रेस के नेता एवं पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला के खिलाफ  भी भ्रष्टाचार की जांच चल रही है। पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी से भी ईडी ने पूछताछ की है। शिव सेना के संजय राउत भी ईडी की जांच के दायरे में हैं और जेल की हवा खा रहे हैं। कुल मिलाकर विपक्षी दल मोदी सरकार को सशक्त चुनौती देने में विफल हो रहे हैं।