गौरीपुत्र श्रीगणेशजी की आराधना से सुख-समृद्धि, खुशहाली मिलती है, साथ ही जीवन के समस्त संकटों का निवारण होता है। धार्मिक व पौराणिक मान्यता के अनुसार प्रत्येक शुभ कार्यों में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेशजी की पूजा सर्वप्रथम की जाती है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि प्रत्येक मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत रखा जाता है। श्रावण कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि 16 जुलाई, शनिवार को दिन में 1 बजकर 28 मिनट पर लगेगी जो कि 17 जुलाई, रविवार को प्रात: 10 बजकर 50 मिनट तक रहेगी। फलस्वरूप 16 जुलाई, शनिवार को संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखा जाएगा। चंद्रोदय रात्रि 9 बजकर 22 मिनट पर होगा। रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चंद्रमा को अघ्र्य देकर उनकी पूजा-अर्चना की जाएगी।
ऐसे करें पूजा— विमल जैन ने बताया कि व्रत के दिन प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठना चाहिए। अपने समस्त दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्ïत्र धारण कर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करनी चाहिए। तत्पश्चात् अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गन्ध व कुश लेकर संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन निराहार व निराजल रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुन: स्नान करके श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा-अर्चना करने का विधान है। श्रीगणेशजी को दूर्वा एवं मोदक अति प्रिय है, उन्हें दूर्वा की माला एवं मोदक के साथ ऋतुफल व मेवे आदि भी अर्पित करने चाहिए।
ऐसे होंगे मनोरथ पूरे— विमल जैन जी के मुताबिक श्रीगणेशजी की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए श्रीगणेश स्तुति, संकटनाशन श्रीगणेश स्तोत्र, श्रीगणेश सहस्रनाम, श्रीगणेश चालीसा, श्रीगणेश अथर्वशीर्ष का पाठ एवं श्रीगणेश जी से संबंधित मंत्र-स्तोत्र आदि जो भी संभव हो अवश्य किया जाना चाहिए। जन्मकुण्डली के अनुसार जिन व्यक्तियों को ग्रहों का अनुकूल फल प्राप्त न हो रहा हो या केतुग्रह की महादशा, अंतर्दशा और प्रत्यंतरदशा में प्रतिकूल फल मिल रहा हो तो उन्हें आज के दिन व्रत उपवास रखकर सर्व विघ्नविनाशक प्रथम पूज्यदेव श्रीगणेशजी का दर्शन-पूजन करके लाभ उठाना चाहिए।
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