नई दिल्ली: भारत के सबसे बड़े कर सुधार माल एवं सेवा कर (जीएसटी) का आधे दशक का सफर 30 जून को पूरा हो गया है। इस दौरान कई तरह के फायदे नजर आए तो कई नुकसान भी दिखे, लेकिन इसे लेकर सबसे बड़ी बात रही कर अनुपालन के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग। इसके चलते हर महीने एक लाख करोड़ रुपए का राजस्व संग्रह एक सामान्य बात हो गई है। राष्ट्रव्यापी माल एवं सेवा कर (जीएसटी) में उत्पाद शुल्क, सेवा कर और मूल्यवर्धित कर (वैट) जैसे 17 स्थानीय कर और 13 उपकर समाहित किए गए और इसे एक जुलाई, 2017 की मध्यरात्रि को लागू किया गया था। जीएसटी में चार स्लैब है, जिसमें आवश्यक सामान पर कर की सबसे कम दर पांच फीसदी और अधिकतम 28 प्रतिशत की दर विलासिता की वस्तुओं पर लगती है। कर की अन्य दरें 12 प्रतिशत और 18 प्रतिशत हैं। जीएसटी से पहले के दौर में एक उपभोक्ता को वैट, उत्पाद शुल्क, सीएसटी आदि को मिलाकर औसतन 31 प्रतिशत कर देना होता था। जीएसटी में वित्तीय संघवाद की अभूतपूर्व कवायद हुई जिसमें केंद्र और राज्य नई कर प्रणाली के सुगम क्रियान्वयन के लिए जीएसटी परिषद में एक साथ आए। परिषद की अबतक 47 बैठकें हो चुकी हैं और जो कदम उठाए गए हैं उनके परिणामस्वरूप प्रतिमाह एक लाख करोड़ रुपए का जीएसटी संग्रह एक नया ‘सामान्य’ बन गया है। सरकार एक जुलाई को जून के जीएसटी संग्रह के आंकड़े जारी करेगी। ऐसे में यह अनुमान है कि बीते चार महीने की तरह इस बार भी संग्रह 1.4 लाख करोड़ रुपए तक होगा। अप्रैल, 2022 में यह संग्रह रिकॉर्ड 1.68 लाख करोड़ रुपए था। अप्रैल, 2018 में संग्रह पहली बार एक लाख करोड़ रुपए के आंकड़े को पार कर गया था। जीएसटी की पांचवीं वर्षगांठ पर केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने ट्वीट किया कि जीएसटी में कई कर और उपकर शामिल हो गए। अनुपालन का बोझ कम हुआ, क्षेत्रीय असंतुलन दूर हुआ और अंतर-राज्य अवरोध भी खत्म हुए। इससे पारदर्शिता और कुल राजस्व संग्रह भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा है। बीडीओ इंडिया में भागीदार और लीडर (अप्रत्यक्ष कर) गुंजन प्रभाकरण ने कहा कि बीते पांच वर्षों में जीएसटी कानून विकसित हुआ है और करदाताओं को आने वाली कई परेशानियों को समयबद्ध स्पष्टीकरण और संशोधनों के जरिए दूर किया गया।
जीएसटी के पांच साल : हर माह एक लाख करोड़ राजस्व संग्रह अब सामान्य बात
