गुवाहाटी : माहेश्वरी समाज में बहुत से लोग है, जो यह नहीं जानते की माहेश्वरी समाज की उत्पत्ति कैसे हुई। माहेश्वरियों का इतिहास क्या है। क्यों माहेश्वरी में विवाह परंपरा को बहुत महत्वपूर्ण विधि माना जाता है। ऐसे में समाज के इतिहास से ऐसे लोगों को अवगत कराना जरूरी है। माहेश्वरी समाज के इतिहास पर नजर डाले तो खंडेलपुर नामक राज्य में सूर्यवंशी क्षत्रिय राजा खड्गलसेन राज्य करता था। इसके राज्य में सारी प्रजा सुख और शांति से रहती थी। राजा धर्मावतार और प्रजाप्रेमी था, परंतु राजा का कोई पुत्र नहीं था। खड्गलसेन इस बात को लेकर चिंतित रहता था कि पुत्र न होने पर उत्तराधिकारी कौन होगा। खड्गलसेन की चिंता को जानकर मत्स्यराज ने परामर्श दिया कि आप पुत्रेष्ठि यज्ञ करवाएं, इससे पुत्र की प्राप्ति होगी। राजा खड्गलसेन ने मंत्रियों से मंत्रणा कर के धोसीगिरी से ऋषियों को ससम्मान आमंत्रित कर पुत्रेष्ठी यज्ञ कराया। यज्ञ के विधिपूर्वक पूर्ण होने पर यज्ञ से प्राप्त हवि को राजा खड्गलसेन और महारानी को प्रसादस्वरूप में भक्षण करने के लिए देते हुए ऋषियों ने आशीर्वाद दिया और साथ में यह भी कहा कि तुम्हारा पुत्र बहुत पराक्रमी और चक्रवर्ती होगा। लेकिन उसे 16 साल की उम्र तक उत्तर दिशा की ओर न जाने देना, अन्यथा आपकी अकाल मृत्यु होगी। कुछ समयोपरांत महारानी ने एक पुत्र को जन्म दिया। राजा ने पुत्र जन्म उत्सव बहुत ही हर्ष उल्लास से मनाया, उसका नाम सुजानसेन रखा। यथासमय उसकी शिक्षा प्रारम्भ की गई। थोड़े ही समय में वह राजकाज विद्या और शस्त्र विद्या में आगे बढ़ने लगा। समय बीतने के साथ सुजानसेन का विवाह चंद्रावती के साथ हुआ। इधर ऋषियों द्वारा कही बात के कारण सुजानसेन को उत्तर दिशा में जाने नहीं दिया जाता था। लेकिन एक दिन राजकुंवर सुजानसेन 72 उमरावो को लेकर हठपूर्वक जंगल में उत्तर दिशा की और ही गया। उत्तर दिशा में सूर्य कुंड के पास जाकर देखा कि वहां महर्षि पराशर की अगुवाई में सारस्वत, ग्वाला, गौतम, श्रृंगी और दाधीच ऋषि यज्ञ कर रहे थे और वेद ध्वनि बोल रहे हैं। यह देख वह आगबबुला हो गया और क्रोधित होकर बोला कि इस दिशा में ऋषि-मुनि शिव की भक्ति करते हैं, यज्ञ करते हैं। इसलिए पिताजी मुझे इधर आने से रोकते थे। उसने क्रोध में आकर उमरावों को आदेश दिया कि इसी समय यज्ञ का विध्वंस कर दो, यज्ञ सामग्री नष्ट कर दो और ऋषि-मुनियों के आश्रम नष्ट कर दो। राजकुमार की आज्ञा पालन के लिए आगे बढे उमरावों को देखकर ऋषि भी क्रोध में आ गए और उन्होंने श्राप दिया की सब निष्प्राण बन जाओ। श्राप देते ही राजकुंवर सहित 72 उमराव निष्प्राण, पत्थरवत बन गए। जब यह समाचार राजा खड्गलसेन ने सुना तो अपने प्राण तज दिए॥ राजा के साथ उनकी आठ रानियां सती हुई। राजकुंवर की कुवंरानी चंद्रावती 72 उमरावों की पत्नियों के सहित ऋषियों की शरण में गई, जिन्होंने इनके पतियों को श्राप दिया था। वे उन ऋषियों के चरणों में गिर पड़ी और और क्षमायाचना करते हुए श्राप वापस लेने की विनती की। तब ऋषियो ने उपाय दिया कि देवी पार्वती के कहने पर भगवान महेश्वर इनमें प्राणशक्ति प्रवाहित करेंगे। तब ये पुनः जीवित व शुद्ध बुद्धि के हो जाएंगे। महेश-पार्वती के शीघ्र प्रसन्नता का उपाय पूछने पर ऋषियों ने कहा कि यहां निकट ही एक गुफा है, वहां जाकर भगवान महेश का अष्टाक्षर मंत्र का जाप करो। राजकुवरानी सारी स्ति्रयों सहित गुफा में गई और मंत्र तपस्या में लीन हो गई। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान महेश देवी पार्वती के साथ वहां आए। पार्वती ने इन जडत्व मूर्तियों को देखा और अपनी अंतर्दृष्टि से इसके बारे में जान लिया। महेश-पार्वती ने मंत्रजाप में लीन राजकुवरानी एवं सभी उमराओं की स्ति्रयों के सम्मुख आकर कहा कि तुम्हारी तपस्या देखकर हम अति प्रसन्न है और तुम्हें वरदान देने के लिए आए हैं, वर मांगो। इस पर राजकुवरानी ने देवी पार्वती से वर मांगा कि हम सभी के पति ऋषियों के श्राप से निष्प्राण हो गए है। अतः आप आप भगवान महेशजी कहकर इनका श्रापमोचन करवाए। देवी पार्वती ने तथास्तु कहा और भगवान महेशजी से प्रार्थना की और फिर भगवान महेश ने सुजानसेन और सभी 72 उमरावों में प्राणशक्ति प्रवाहित करके उन्हें चेतन कर दिया। चेतन अवस्था में आते ही सभी ने महेश-पार्वती का वंदन किया और अपने अपराध पर क्षमा याचना की। इसपर भगवान महेश ने कहा कि अपने क्षत्रियत्व के मद में तुमने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया है। तुमसे यज्ञ में बाधा डालने का पाप हुआ है, इसके प्रायश्चित के लिए अपने-अपने हथियारों को लेकर सूर्यकुंड में स्नान करो। ऐसा करते ही सभी उमरावों के हथियार पानी में गल गए। स्नान करने के उपरांत सभी भगवान महेश-पार्वती की जयजयकार करने लगे। फिर भगवान महेश ने कहा कि सूर्यकुंड में स्नान करने से तुम्हारे सभी पापों का प्रायश्चित हो गया है तथा तुम्हारा क्षत्रितत्व एवं पूर्व कर्म भी नष्ट हो गये है। यह तुम्हारा नया जीवन है, इसलिए अब तुम्हारा नया वंश चलेगा। तुम्हारे वंशपर हमारी छाप रहेगी। देवी माहेश्वरी (पार्वती) द्वारा तुम्हारी पत्नियों को दिए वरदान के कारन तुम्हें नया जीवन मिला है, इसलिए तुम्हें माहेश्वरी के नाम से जाना जाएगा। तुम हमारी (महेश-पार्वती) की संतान की तरह माने जाओगे। तुम दिव्य गुणों को धारण करने वाले होंगे।
(योगी प्रेमसुखानंद माहेश्वरी द्वारा लिखित पुस्तक- माहेश्वरी, वंशोत्पत्ति एवं इतिहास से साभार)