बरगद, पीपल, अशोका, कीकर, कचनार, जंगली जलेबी, ईमली व पिलकन। इनका नाम आते ही दिमाग में विशालकाय पेड़ घूमने लगते हैं। ये पेड़ किसी समय पंजाब के हर गांव, हर आंगन और पंचायत की चौपाल पर आम ही नजर आते थे। पर 21वीं सदी में विकास की आंधी और कंकरीट के बढ़ते जंगलों के बीच ये पारंपरिक पेड़ शहरों में से लगभग लुप्त ही हो चुके हैं। वहीं गांवों में भी इक्का-दुक्का ही नजर आएंगे। ऐसे में पंजाब के पुराने पेड़ों को बचाने के लिए कुछ पर्यावरण प्रेमियों ने अनोखी पहल की है। इन पर्यावरण प्रेमियों ने जैपनीज आर्ट की मदद से इन विशालकाय पेड़ों को गमलों में समेट रखा है। इनमें से कई को प्रकृृति के पास रहने का सुकून मिला तो उनका शौक परवान चढ़ता गया। फिर उन्होंने इन पेड़ों की संभाल शुरू की। ये पर्यावरण प्रेमी जब गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा, सराभा नगर में आयोजित फ्लावर शो में पहुंचे तो खूब सराहना मिली। गुरु नानक देव इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर प्रोफेसर गुरमुख सिंह पिछले 30 साल से अपने घर में पारंपरिक पेड़ अशोका, पीपल, तारामड़ी, कीकर, बेहड़ा, जंट, गुलार, नीम, ईमली, जेड़, पिलकन, गुलमोहर, कचनार, जंगली जलेबी, फलाही सहित ऐसे कई पेड़ों को गमलों में उगा रहे हैं। इनके पास पीपल के पेड़ की कम से कम दस किस्में ऐसी हैं, जिनकी उम्र 20 वर्ष से अधिक है। प्रो. गुरमुख कहते हैं कि जैपनीज आर्ट की मदद से उन्होंने ऐसे पेड़ों को गमलों में लगा रखा, जिसे बढ़ने, फलने-फूलने में बहुत अधिक जगह की जरूरत नहीं होती। इन पेड़ों की काफी देखभाल करनी पड़ती है।