पूर्वोतर क्षेत्र के चाय बागानों एवं वनवासी क्षेत्रों में शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए वनबंधु परिषद की बैनर तले चल रहे एकल विद्यालय महत्वपूर्ण भूमिका रहे हैं। इससे वनांचल क्षेत्र में रहने वाले बच्चों को शिक्षा का अवसर मिल रहा है। वनबंधु परिषद पूर्वोत्तर क्षेत्र में 7,000 एकल विद्यालय चला रहा है, जिसमें 5,000 एकल विद्यालय असम में है। असम के चाय बागान क्षेत्रों में 4,000 तथा अन्य वनवासी क्षेत्रों में 1,000 एकल विद्यालय चल रहे हैं। एकल विद्यालय के तहत एक शिक्षक तथा 30 से 40 विद्यार्थी होते हैं। विद्यालय के संचालन के लिए एक कमेटी होती है, जिससे उक्त गांव के तथा आसपास के लोग जुड़े होते हैं। एकल विद्यालयों का उस क्षेत्र के राजनीतिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में काफी प्रभाव होता है। एकल विद्यालय चाय बागानों एवं वनांचल में ग्रामीणों द्वारा ग्रामीणों के लिए किया गया एक जन-आंदोलन बन चुका है, जिसको सभी स्तरों पर महसूस किया जा रहा है। इस आंदोलन के पीछे वनबंधु परिषद की मेहनत रंग ला रही है। पूर्वोत्तर क्षेत्र में वनबंधु परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण बजाज जैसे लोगों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। उनके दिशा-निर्देशन में पंचमुखी शिक्षा को धरातल पर उतारने का काम चल रहा है। पंचमुखी शिक्षा के तहत प्राथमिक शिक्षा, आरोग्य शिक्षा, ग्रामीण विकास, संस्कार शिक्षा एवं जागरण शिक्षा विद्यार्थियों को दिया जाता है। अरुण बजाज के अनुसार एकल विद्यालय के तहत तीन वर्ष का कार्यक्रम होता है, जिसके तहत अक्षर ज्ञान, गणित, योगा एवं समाज ज्ञान की शिक्षा दी जाती है, ताकि उस क्षेत्र में रहने वाले विद्यार्थी आगे की चुनौतियों के लिए तैयार हो सकें। एकल विद्यालय के तहत वर्ग-1 से वर्ग-3 तक की पढ़ाई होती है। वनबंधु परिषद स्वामी विवेकानंद के सिद्धांत पर आगे बढ़ रहा है। विवेकानंद ने कहा था कि अगर बच्चे विद्यालय तक नहीं पहुंचते हैं तो विद्यालयों को बच्चों तक पहुंचना चाहिए। यही काम वनबंधु परिषद एकल विद्यालयों के माध्यम से कर रहा है। इन विद्यालयों के माध्यम से शिक्षित, स्वस्थ एवं सशक्त भारत का निर्माण किया जा रहा है। मालूम हो कि असम में वनबंधु परिषद के चार चैप्टर काम कर रहे हैं, जिसमें गुवाहाटी चैप्टर की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। इसके अलावा सिलचर, तिनसुकिया एवं डिब्रूगढ़ चैप्टर के तहत भी काम हो रहा है। वनबंधु परिषद के काम को आगे बढ़ाने में जोनल चेयरमैन सुभाष सिकरिया एवं गुवाहाटी शाखा के चेयरमैन विजय अग्रवाल भी अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। चारों चैप्टर के तहत 7,000 ग्राम समितियां काम करती हैं। विभिन्न समितियों के माध्यम से तीन लाख से ज्यादा लोग जुड़े हुए हैं। एकल विद्यालयों में प्राथमिक शिक्षा के साथ-साथ बच्चों में संस्कार देने का काम भी किया जाता है। पठन कार्य को दिलचस्प बनाने के लिए खेल-कूद के माध्यम से भी शिक्षा दी जाती है, ताकि बच्चों पर पढ़ाई बोझ न लगे। शिक्षा को गुरुकुल पद्धति द्वारा वैज्ञानिक तरीके से दी जाती है, ताकि विद्यार्थी भविष्य के लिए तैयार हो सके। इस दौरान ग्रामीण विकास को भी ध्यान में रखा जाता है। छोटे-मोटे कामों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है, जिससे कि पढ़ाई के साथ-साथ रोजगार के भी अवसर पैदा हो सके। चाय बागानों एवं वनवासी क्षेत्रों में स्कूल नहीं होने तथा गरीबी के कारण बच्चे स्कूल तक नहीं पहुंच पाते हैं। इसी को ध्यान में रखकर वनबंधु परिषद ने यह काम शुरू किया है। अब तक लाखों बच्चे इन एकल विद्यालयों से पढक़र आगे निकल चुके हैं। राज्य के चाय बागानों के लिए एकल विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में एक क्रांति ला रहा है। वनबंधु परिषद के इस पहल का राजनीति के क्षेत्र में भी प्रभाव पड़ रहा है। वनबंधु परिषद के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े होने के कारण इस राजनीतिक लाभ भाजपा को मिल रहा है। चाय बागान क्षेत्रों में भाजपा की मजबूत स्थिति के लिए काफी हद तक एकल विद्यालयों की भूमिका एवं वनबंधु परिषद के काम महत्वपूर्ण साबित हो रहा है। इसकी महत्ता को भाजपा निश्चित रूप से महसूस कर रही होगी। इन सबके पीछे वनबंधु परिषद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अरुण बजाज एवं अन्य पदाधिकारियों की मेहनत है।
चाय बागानों व वनांचलों में एकल विद्यालयों की सशक्त भूमिका
