देश के विभिन्न न्यायालयों में साढ़े चार करोड़ से ज्यादा मुकदमें लंबित हैं। यह आंकड़ा 15 सितंबर 2021 तक का है। इसके बाद इसकी संख्या में और बढ़ोतरी हुई होगी। मुकदमों की प्रक्रिया में विलंब होने से संबंधित लोगों को समय से न्याय नहीं मिल पाता है। इस कारण लोगों का विश्वास न्यायपालिका से कम होता जा रहा है। नई दिल्ली में राज्य के मुख्यमंत्रियों तथा उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन में लंबित मुकदमों का मुद्दा जोर-शोर से उठा। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण उपस्थित थे। इस सम्मेलन में लंबित केसों की सूची के अलावा न्यायपालिका में रिक्त पड़े विभिन्न पदों एवं कमजोर बुनियादी ढांचा पर भी विशेष रूप से चर्चा हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन को संबोधित करते हुए न्यायालयों में ज्यादा से ज्यादा स्थानीय भाषा के प्रयोग की महत्ता पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्थानीय भाषा के प्रयोग से लोगों का विश्वास न्यायपालिका की ओर बढ़ेगा। मोदी ने कहा कि व्याप्त कानूनों को और सरल बनाने की जरूरत है। मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने अपने संबोधन में सरकारों को आईना दिखाया। उन्होंने कहा कि 50 प्रतिशत मामले सरकारों से संबंधित हैं। सरकारें जान-बूझकर अदालती आदेशों पर अमल नहीं करती। इस कारण बाध्य होकर लोगों को अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ता है। लंबित केसों में आधे केस अदालत की अवमानना से संबंधित हैं। उन्होंने कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका को मिलकर काम करने की आवश्यकता पर बल दिया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि कार्यपालिका ठीक से काम नहीं कर रही है तथा विधायिका का ठीक से उपयोग नहीं हो रहा है। उन्होंने लंबित केसों के लिए जजों की कमी एवं कमजोर बुनियादी सुविधा को जिम्मेवार ठहराया। हाईकोर्ट में भी जजों के 388 पद रिक्त हैं। वर्ष 2016 के मुकाबले विभिन्न न्यायालयों में जजों की संख्या में और कमी आ गई है। न्यायमूर्ति रमण ने कहा कि खाली पदों को भरने के लिए संबंधित ऑथोरिटी को त्वरित कदम उठाना चाहिए। बुनियादी सुविधा के विकास के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक प्राधिकरण बनाने का सुझाव दिया, जिसकी शाखाएं राज्यों में हो। वर्ष 2015 में केंद्र सरकार ने देश में लागू 1800 कानूनों को अप्रासंगिक घोषित किया था। सरकार का कहना था कि इस तरह के कानून हटने से जल्द न्याय मिलेगा। केंद्र सरकार ने इनमें से 1450 कानूनों को अभी तक खत्म कर दिया है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि देश की राज्य सरकारें अभी तक केवल 75 कानूनों को ही खत्म की है। इस मामले में राज्य सरकारों को तेजी लानी होगी। पुलिस विभाग को भी लंबित मामले में अपनी जांच प्रक्रिया तेज करनी होगी ताकि पीडि़त व्यक्ति समय से न्याय मिल सके। विभिन्न जेलों बंद विचाराधीन कैदियों के बारे में भी न्यायालय को गंभीरता से सोचना होगा। जल्द फैसले के अभाव में ऐसे विचाराधीन कैदी वर्षों तक जेल में बंद रहते हैं, जबकि उन पर आरोप साबित नहीं होता है।
लंबित मुकदमों पर मंथन
