रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की भारत यात्रा राजनीतिक दृष्टिकोण से काफी अहम रही। अमरीका एवं ब्रिटेन सहित पश्चिमी देश लगातार भारत पर रूस का विरोध करने के लिए दबाव डाल रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अपनी कूटनीति के जरिए विश्व में धाक जमा चुका है। भारत की कूटनीति का लोहा आज दुनिया मानती है। रूस-यूक्रेन मामले में भारत शुरू से ही तटस्थ भूमिका निभा रहा है। अमरीका भी भारत को अपने पाले में लाने के लिए दबाव डालता रहा है, किंतु वह सफल नहीं हो सका है। भारत अपने राष्ट्रहित के अनुसार निर्णय ले रहा है। ब्रिटेन भी भारत को अपने पाले में लाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ा। अंत में ब्रिटेन को झुकना पड़ा। प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने अपनी भारत यात्रा के दौरान द्विपक्षीय एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर फोकस किया, लेकिन यूक्रेन युद्ध के बारे में कोई ऐसा बयान नहीं दिया, जिससे भारत-रूस संबंधों पर विपरीत असर पड़े। भारत का शुरू से ही मत है कि युद्ध तत्काल बंद होना चाहिए तथा कूटनीतिक तरीके से समस्या का हल होना चाहिए। यही बात प्रधानमंत्री ने जॉनसन के साथ हुए संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कही। दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बैठक में वर्ष 2030 तक भारत-ब्रिटेन का व्यापार दुगुना करने के लक्ष्य की प्रगति की समीक्षा की गई। जनवरी 2022 से ही दोनों देश इस बात पर सहमत हुए थे। भारत और ब्रिटेन के बीच अक्तूबर 2022 तक समग्र एवं संतुलित मुक्त व्यापार समझौता होने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। भारत ने ब्रिटेन को राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है। दोनों ही देशों ने जमीन, समुद्र, आकाश एवं साइबर खतरे से निपटने के लिए मिलकर काम करने का निर्णय लिया है। पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमानों के निर्माण एवं नौवहन के क्षेत्र में सहयोग पर भी बातचीत हुई है। मुक्त, खुला एवं सुरक्षित हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए काम करने के लिए दोनों देश सहमत हुए हैं। मालूम हो कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की दादागिरी से सभी पड़ोसी देश परेशान हैं। भारत-चीन सीमा पर भी पिछले वर्ष से ही तनातनी चल रही है। दोनों देशों की सेना एक-दूसरे के सामने खड़ी है। ऐसी स्थिति में भारत-ब्रिटेन सहयोग जरूरी है। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में लक्ष्य हासिल करने के लिए ब्रिटेन ने एक अरब डॉलर के वित्त पोषण का प्रस्ताव दिया है। यूरोपीय यूनियन से अलग होने के बाद ब्रिटेन को एक बड़ा बाजार चाहिए। भारत में ब्रिटेन को संभावना दिख रही है। रक्षा के क्षेत्र में भी ब्रिटेन भारत के साथ काम करना चाहता है। मोदी सरकार रक्षा के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ‘मेक-इन-इंडिया’ के तहत काम करना चाहती है। बाहरी कंपनियों को भारत में आकर काम करने का मौका दे रही है। कुछ विदेशी कंपनियां तकनीकी हस्तांतरण से कन्नी काट रही हैं। दुनिया की राजनीति में आज भारत की अहमियत काफी बढ़ गई है। रूस तथा अमरीका दोनों भारत को अपने पक्ष में करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे हैं। लेकिन भारत अपने राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर फैसले ले रहा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की भारत यात्रा के दौरान भारत की धरती पर रूस की आलोचना न होना बड़ी कूटनीतिक जीत कही जा सकती है। रूस भारत का भरोसेमंद सहयोगी रहा है, जो मुश्किल वक्त में भारत के लिए खड़ा रहा है। हमें ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करना है, किंतु किसी तीसरे देश की कीमत पर नहीं।
भारत-ब्रिटेन संबंध
