भारतीय संस्कृति के सनातन धर्म में पौराणिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीगणेशजी की महिमा अपरंपार है। हिंदू धर्मशास्त्रों में प्रथम पूज्य देव भगवान श्रीगणेशजी को सर्वोपरि माना जाता है। हर शुभकार्यों के प्रारंभ में श्री गणेशजी की पूजा-अर्चना सर्वप्रथम करने का विधान है। सुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखने की धार्मिक मान्यता चली आ रही है। यह व्रत महिला एवं पुरुष के लिए समान रूप से फलदायी है। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी इस बार मंगलवार, 19 अप्रैल को पड़ रही है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि वैशाख कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि मंगलवार, 19 अप्रैल को सायं 4 बजकर 39 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन बुधवार, 20 अप्रैल को दिन में 1 बजकर 54 मिनट तक रहेगी। जिसके फलस्वरूप संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत मंगलवार, 19 अप्रैल को रखा जाएगा। चंद्रोदय रात्रि 9 बजकर 19 मिनट पर होगा। मंगलवार के दिन पडऩेवाली चतुर्थी अंगारकी श्रीगणेश चतुर्थी के नाम से भी जानी जाती है। श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चन्द्रमा को अघ्र्य देकर किया जाएगा।
ऐसे होंगे श्रीगणेशजी प्रसन्न : ज्योतिर्विद् विमल जैन ने बताया कि संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत के दिन प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर अपने समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होना चाहिए। तत्पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के उपरांत अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, फल, गंध व कुश लेकर संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन निराहार रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुन: स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करके पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख होकर श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार अथवा षोडशोपचार से पूजा-अर्चना करनी चाहिए। श्रीगणेशजी को दूर्वा एवं मोदक अति प्रिय है, इसलिए दूर्वा की माला, ऋतुफल, मेवे एवं मोदक अवश्य अर्पित करने चाहिए।
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