वर्तमान समय में पूरी दुनिया पर्यावरण को बचाने का प्रयास कर रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इसके समाधान के लिए प्रयास जारी हैं। पर्यावरण के साथ पूरी दुनिया को कैसे बचाया जाए,इसको लेकर प्रयास किए जा रहे हैं। राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर वृक्षारोपण पर जोर दिया जा रहा है। प्लास्टिक का उपयोग कम करने के लिए जनजागरुकता फैलाई जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार प्लास्टिक के उपयोग को कम करने की अपील कर चुके हैं। असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत विश्वशर्मा ने हाल ही में कैबिनेट बैठक में राज्य को प्लास्टिक मुक्त कैसे बनाया जाए, इस पर विचार-विमर्श किया और इस पर अमल के लिए कार्य योजना भी बनाई है। दूसरी ओर राज्य के विभिन्न इलाकों में अपनी सेवाएं दे रहे सैनिक और अर्द्धसैनिक बलों की ओर से राज्य के कई इलाकों में वृक्षारोपण कर पर्यावरण को बचाने की कोशिश की गई और विभिन्न मौके पर ऐसा कर प्रकृति के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाहन किया जा रहा है। निस्संदेह राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रकृति को बचाने की मुहिम चल रही है, परंतु इस मुहिम के प्रति जो समर्पण की भावना होनी चाहिए,उसमें बेहद कमी दिख रही है,यह कार्य महज फैशन बन गया है। आम लोगों से लेकर राजनेता तक वृक्षारोपण करते हुए अपनी तस्वीर खिंचवाकर  और उन्हें मीडिया में प्रकाशित और प्रसारित करवाकर अपने कर्त्तव्यों की इतिश्री कर लेते हैं और जो उनका मूल उद्देश्य है, उसे पूरा नहीं करते हैं। ऐसे में पर्यावरणा प्रदूषित हो रहा है और रेगिस्तान घटने की जगह और बढ़ रहा है। यह हमारे कर्तव्यों के दुस्परिणाम का नतीजा है। ऐसी बात नहीं है कि इससे सिर्फ हमारा देश प्रभावित हो रहा है,बल्कि देश के और कई देश प्रभावित हो रहे हैं। विश्व के कई इलाकों में ग्लोबल वार्मिंग का असर दिखने लगा है। इसी कड़ी में  विश्व के अन्य देशों की स्थिति को समझने की जरूरत है। मंगोलिया और चीन के पश्चिमोत्तर तक फैला इलाका, दुनिया में सबसे तेज गति से रेगिस्तान में तब्दील हो रहा है। आकार में ये 12 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। गोबी रेगिस्तान इसमें हर साल करीब 6,000 वर्ग किलोमीटर का इजाफा कर देता है। फैलता हुआ ये रेगिस्तान घास के मैदानों को चपट कर जाता है, गांव के गांव निगल जाता है और बड़े पैमाने पर उर्वर भूमि को एक निर्जन उजाड़ में बदल देता है। हजारों लोग विस्थापित होने को विवश होते हैं और कुछ एक हजार ही उन्हीं उजाड़ों में रहने को अभिशप्त हैं। मरुस्थलीकरण वो प्रक्रिया है जिसके तहत उर्वर मिट्टी रेगिस्तान में बदल जाती है। यूं तो इसके पीछे कई कुदरती वजहें भी हैं लेकिन इसके द्रुत विस्तार में इंसानों की भूमिका भी निर्णायक रही है। पृथ्वी की सतह का एक तिहाई हिस्सा बंजर हो चुका है और लगातार मरुस्थलों का विस्तार हो रहा है।  तस्वीर में देखा जा सकता है कि अल्जीरिया में हॉगर पहाड़ी इलाके हजारों साल में किस तरह मरुस्थल चट्टानों का रूप ले चुके हैं। दुनिया में मिट्टी की गुणवत्ता में गिरावट की चार प्रमुख वजहे हैं-औद्योगिक कृषि में पानी का अत्यधिक इस्तेमाल, गंभीर सूखे की बढ़ती मियाद, निर्वनीकरण और मवेशियों के लिए चरागाहों का जरूरत से ज्यादा दोहन। पहले उर्वर और हरे-भरे रह चुके लैंडस्केप रूखे-सूखे, रेतीले इलाकों में तब्दील होकर दुनिया भर में करीब एक अरब लोगों की जिंदगियों पर खतरा बने हुए हैं।  लाखों प्रजातियों का जीवन भी उनकी वजह से संकट में है। आकलनों के मुताबिक इस सदी के मध्य तक धरती की एक चौथाई मिट्टी मरुस्थलीकरण से प्रभावित होगी। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि वैश्विक स्तर पर पर्यावरण को बचाने के लिए कार्य करने की जरूरत है और उम्मीद है कि धरती को बचाने के लिए विश्व समुदाय एकजुट होकर कारगर कदम उठाएगा।