भारत-चीन के बीच सीमाई समस्या कोई नई नहीं है, पिछले दो-तीन सालों में इसमें बढ़ोतरी दर्ज की गई है। फिलहाल इलाके का ज्यादातर हिस्सा बर्फ से ढंका हुआ है और शून्य से नीचे तापमान में भी सैनिक गश्त लगा रहे हैं, इससे स्पष्ट हो जाता है कि स्थिति तनावपूर्ण, परंतु नियंत्रण में है। भारत और चीन ने जुलाई 2020 के बाद अब तक 20 बार बातचीत की है। यह वही समय था जब दोनों देशों के सैनिकों की गलवान नदी घाटी में झड़प हुई थी और कम से कम 20 भारतीय सैनिकों की मौत हुई थी। चीन की सेना ने बाद में बताया कि उसके चार सैनिकों की मौत हुई। पूर्वी लद्दाख के इलाके में मौजूद गलवान घाटी दोनों देशों के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर मौजूद उन इलाकों में है जिन्हें लेकर विवाद चलता रहा है। हाल ही में चीनी सेना पर अरुणाचल से एक किशोर के अपहरण की खबर आई थी और राहत की बात है कि भारत सरकार के दबाव के कारण चीनी सेना ने उक्त किशोरको भारतीय सेना को सौंप दिया है। भारत और चीन के सैन्य कमांडरों के बीच जनवरी की शुरुआत में हुई ताजा बातचीत बिना किसी प्रगति के ही खत्म हो गई। तीन महीने पहले हुई बातचीत का भी यही हाल हुआ था। बातचीत में रुकावटों का होना स्वाभाविक है। करीब 3500 किलोमीटर लंबी अस्पष्ट सीमा की रेखा कहां से गुजरे इसे लेकर दोनों देशों की एक राय नहीं है। बहुत सारे क्षेत्रों पर भारत और चीन दोनों दावा करते हैं। खासतौर से जब सीमाओं को लेकर समझ में इतना फर्क हो तो मामला बहुत गहरा और लंबे समय तक लंबित हो जाता है। चीन ने जिन इलाकों पर अब कब्जा कर लिया है वो उसे छोड़ कर नहीं जाएंगे। भारत और चीन दोनों का कब्जा कुछ ऐसे हिस्से पर है जिसे दूसरा पक्ष अपना बताता है। भारत लगातार चीनी सेना पर घुसपैठ के आरोप लगाता रहा है। सीमा रेखा के पास चीन की सेनाओं की तरफ से किए जा रहे निर्माण को लेकर कार्रवाई करने का भारत पर बहुत दबाव बन रहा है। इसी महीने भारत में राज्यों के चुनाव होने हैं। ऐसे में भारत सरकार ऐसा कोई फैसला नहीं लेगी जिसे चीन के सामने हथियार डालने की तरह से देखा जाए। दूसरी ओर सीमा-रेखा तय करने का काम इतनी जल्दी नहीं होगा। तनाव जब उभरेंगे तब उनसे उबरने के तरीके और तंत्र भी विकसित होंगे, बावजूद इसके मूल समस्या बनी रहेगी। एक बात जरूर माननी चाहिए कि भारत और चीन दोनों के पास मुद्दों से निपटने के अलग तरीके हैं, इसका कुछ कारण तो यह है कि दोनों की राजनीतिक संरचना अलग है। इसके साथ ही दोनों की वैश्विक स्थिति भी अलग है। हर चीज एक एक करके आगे बढ़ेगी और यही होना भी चाहिए जिसमें दोनों पक्षों के हित और फायदों का ख्याल रखा जाए, इसका मतलब है कि बिना किसी बाधा के लगातार बातचीत ही एकमात्र रास्ता है। गलवान घाटी की घटना के बाद कुछ और छोटी मोटी घटनाएं हुई हैं। यहां तक कि सीमा पर 45 सालों में पहली बार गोलीबारी भी हुई, हालांकि इनमें किसी की जान नहीं गई। दोनों पक्षों में खूनी झड़प जून, 2020 में ही हुई थी। कई दौर की बातचीत के बावजूद परमाणु ताकत से लैस दोनों पड़ोसियों में तनाव घटने का नाम नहीं ले रहा है। दोनों पक्षों ने दसियों हजार सैनिकों को तैनात कर रखा है और साथ ही टैंक और लड़ाकू विमानों समेत भारी सैन्य हथियारों का जमावड़ा भी है। इसके साथ ही भारत और चीन के सैनिक नए साल पर गलवान घाटी में अपने अपने देशों का झंडा भी फहरा चुके हैं। फिलहाल आशंका भरा माहौल है और हालात कभी भी बिगड़ सकते हैं। ऐसे में बातचीत से मामले का समाधान हो, ऐसा कदम दोनों देशों को उठाना चाहिए।
भारत-चीन सीमा
