वैसे तो देश के पांच राज्यों- यूपी, उत्तराखंड, गोवा, मणिपुर और पंजाब में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं, परंतु अधिकांश लोगों की नजर यूपी चुनाव पर है। कहा जा रहा है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश की सत्ताधारी पार्टी भाजपा हर हाल में यूपी में चुनाव जीतना चाहती है। यदि 2022 में भाजपा यूपी चुनाव जीत जाती है तो उसके लिए 2024 में लोकसभा चुनाव जीतना आसान होगा। इसलिए भाजपा ने हर हालत में इस चुनाव को जीतने के लिए कवायद तेज कर दी है। दूसरी ओर यहां विधानसभा चुनाव से पहले नए राजनीतिक समीकरण भी सामने आ रहे हैं। एक दूसरे के समर्थन में सेंध लगाने के लिए राजनीतिक दल तमाम उपाय कर रहे हैं। आखिर जनता के फैसले का आधार क्या होगा? बीते बुधवार को भारतीय जनता पार्टी ने समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव की बहू अपर्णा बिष्ट यादव को पार्टी में शामिल करके अपने चौदह विधायकों और मंत्रियों के पार्टी छोड़ने के गम को भुलाने और अखिलेश यादव के परिवार में सेंध लगाने की खुशी भले ही मनाई हो लेकिन इतनी बड़ी संख्या में विधायकों और नेताओं के जाने की अभी और कीमत चुकानी पड़ सकती है। यूपी बीजेपी में मची इस भगदड़ का फायदा बीजेपी के सहयोगी दल भी उठाने में लगे हैं। अन्य पिछड़े वर्ग के एक दर्जन से ज्यादा विधायकों के पार्टी छोड़ने के बाद बीजेपी बैकफुट पर है और नहीं चाहती कि अब कोई और मौजूदा विधायक पार्टी छोड़े या फिर कोई सहयोगी दल उनसे अलग हो। इन नेता के मुताबिक पिछले सात-आठ साल में बीजेपी ने जिस तरह से अन्य पिछड़ी जातियों को पार्टी से जोड़ा है, उस अभियान को पहली बार गहरा धक्का लगा है। इन विधायकों के पार्टी छोड़कर जाने से ना सिर्फ विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान होगा बल्कि पार्टी के सामाजिक आधार को भी नुकसान पहुंचेगा जिसे बड़ी मुश्किल से तैयार किया गया था। बीजेपी नेता योगी आदित्यनाथ मार्च 2017 से उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री हैं। 2017 में राज्य के चुनावों में जीत हासिल करने के बाद जब बीजेपी ने उन्हें मुख्यमंत्री पद के लिए चुना था उस समय वो गोरखपुर से लोकसभा के सदस्य थे। मुख्यमंत्री बनने के लिए उन्हें लोकसभा से इस्तीफा देना पड़ा। लेकिन उसके बाद वो विधानसभा की किसी सीट से उपचुनाव लड़ने की जगह विधान परिषद के सदस्य बन गए। यूपी में बीजेपी की मुख्य रूप से अब दो सहयोगी पार्टियां रह गई हैं- अपना दल (सोनेलाल) और निषाद पार्टी। अपना दल तो बीजेपी के साथ 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त से ही गठबंधन में है लेकिन निषाद पार्टी के साथ गठबंधन नया है। स्वामी प्रसाद मौर्य और उनके साथियों के समाजवादी पार्टी में शामिल होने के बाद जिस तरह से नब्बे के दशक वाली मंडल-कमंडल की राजनीति एक बार फिर चर्चा में है,उसे देखते हुए दोनों ही पार्टियां अब बीजेपी पर दबाव बना रही हैं और इस स्थिति में बीजेपी इन्हें नजरअंदाज नहीं कर पाएगी। दोनों के ही पास समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में जाने के विकल्प अभी भी खुले हुए हैं, ये बीजेपी को भी पता है। इसलिए बीजेपी पूरी कोशिश करेगी कि इन्हें अपने साथ ही रखा जाए। कुछ दिन पहले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक इंटरव्यू में कहा था कि यूपी में लड़ाई 80 बनाम 20 की है. उन्होंने इस अनुपात को बहुत स्पष्ट तो नहीं किया लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि उनका इशारा हिंदू बनाम मुसलमान की ओर था। योगी सरकार के कैबिनेट मंत्री स्वामी प्रसाद मौर्य जब बीजेपी छोड़कर समाजवादी पार्टी में गए तो उन्होंने पार्टी दफ्तर में अपने भाषण में इसी तर्ज पर कहा कि लड़ाई 85 बनाम 15 की है। 85 फीसदी हमारा है और 15 फीसदी में भी बंटवारा है। स्वामी प्रसाद मौर्य के इस बयान को नब्बे के दशक की मंडल-कमंडल की राजनीति की ओर लौटने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
बदलते समीकरण
