ज्योतिर्विद् विमल जैन
भारतीय संस्कृति के हिंदू धर्मशास्त्रों में पंचदेवों में प्रथम पूज्य देव भगवान श्रीगणेशजी को सर्वोपरि माना गया है। सुख-समृद्धि के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत रखने की धार्मिक परंपरा है। प्रत्येक माह के कृष्णपक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी तिथि के दिन संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत रखने की मान्यता है। प्रख्यात ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रथम पूज्यदेव श्रीगणेशजी का प्राकट्य महोत्सव माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि के दिन मनाने की धार्मिक व पौराणिक मान्यता है। माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि को वक्रतुण्ड चौथ, माघी चौथ, संकष्टी तिल चतुर्थी, तिल चौथ, तिलकुटा चौथ एवं गौरी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस बार यह पर्व शुक्रवार, 21 जनवरी को विधि-विधानपूर्वक हर्षोल्लास के साथ मनाया जाएगा। माघ कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि शुक्रवार, 21 जनवरी को प्रातः 8 बजकर 52 मिनट पर लगेगी जो कि अगले दिन शनिवार, 22 जनवरी को प्रातः 9 बजकर 15 मिनट तक रहेगी। चंद्रोदय रात्रि 8 बजकर 40 मिनट पर होगा। चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी तिथि के दिन यह व्रत रखने का विधान है। रात्रि में चंद्र उदय होने के पश्चात् चंद्रमा को अर्घ्य देकर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन श्रीगणेशजी की पूजा-अर्चना करके व्रत करना विशेष कल्याणकारी रहता है। संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी व्रत आज से करें प्रारंभः विमल जैन ने बताया कि माघ मास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी तिथि से संकष्ठी श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का प्रारंभ किया जाता है। यह व्रत महिला, पुरुष अथवा विद्यार्थी दोनों के लिए समान रूप से फलदाई है। श्रीगणेशजी की विशेष कृपा प्राप्ति के लिए संकष्टी श्रीगणेश चतुर्थी का व्रत नियमित रूप से चार वर्ष या चौदह वर्ष तक किया जाता है। व्रत का विधान : व्रत के दिन प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर समस्त दैनिक कृत्यों से निवृत्त होकर अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा-अर्चना करने के पश्चात् श्रीगणेश चतुर्थी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। संपूर्ण दिन शुचिता के साथ निराहार व निराजल रहते हुए व्रत के दिन सायंकाल पुनः स्नान करके श्रीगणेश जी की पंचोपचार, दशोपचार या षोडशोपचार पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
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