उत्तर प्रदेश में चुनावी शंखनाद के बाद सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए नए-नए सियासी समीकरण बनाने में जुट गई हैं। दल-बदलू नेतागण समय को भांपकर जिताऊ नौका पर सवार हो रहे हैं। इसमें सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को ज्यादा नुकसान हो रहा है। वर्तमान राजनीतिक माहौल देखकर ऐसा लग रहा है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में मुख्य रूप से भाजपा गठबंधन का मुकाबला समाजवादी पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन से होगा। ज्यादातर क्षेत्रीय पार्टियां इन्हीं दो गठबंधनों के साथ जुड़ रही हैं। हालांकि इस चुनाव में मायावती के नेतृत्व वाली बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस तथा ओवैशी के नेतृत्व वाला गठबंधन बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने का माद्दा रखती हंै। बड़ी पार्टियां छोटी पार्टियों को इसलिए पार्टी में रख रही हैं, क्योंकि बहुत कम अंतर से कई विधानसभा सीटों का निर्णय होने वाला है। समय की नजाकत को देखते हुए छोटी पार्टियां भी ज्यादा सीट पाने के लिए दबाव की राजनीति अपनाने से पीछे नहीं हट रही हैं। मायावती ने आगामी विधानसभा चुनाव के लिए राज्य की दस छोटी-छोटी पार्टियों- इंडिया जनशक्ति पार्टी, पचास परिवर्तन समाज पार्टी, विश्व शांति पार्टी, संयुक्त जनादेश पार्टी, आदर्श संग्राम पार्टी, अखंड विकास भारत पार्टी, सर्वजन आवाज पार्टी, आधी आबादी पार्टी, सर्वजन सेवा पार्टी और जागरूक जनता पार्टी के साथ गठबंधन करने का ऐलान किया है। इन सभी दस पार्टियों का उत्तर प्रदेश में कोई विशेष प्रभाव नहीं है। भाजपा को चुनौती अखिलेश ने सर्वप्रथम अपने चाचा शिवपाल को अपने खेमे में लाकर दी। उसके बाद राष्ट्रीय लोकदल, ओमप्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, कृष्णा पटेल की नेतृत्व वाले अपना दल के साथ तालमेल किया है। इसके बाद सपा ने अपने जातीय समीकरण को और मजबूत करने के लिए भाजपा से बगावत कर आए स्वामी प्रसाद मौर्य, दारा सिंह चौहान सहित कुछ नेताओं को अपने कुनबे में शामिल किया।  ये सभी नेता अपनी संतानों का टिकट सुनिश्चित करने के लिए सपा की साइकिल पर सवार हुए हैं। हालांकि ये भविष्य में अखिलेश यादव के लिए मुसीबत खड़ी करते रहेंगे। भाजपा भी वंशवाद की चुनौती का सामना कर रही है। कुछ नेता तो पहले ही अपना पाला बदल चुके हैं। कुछ नेता अभी भी अपनी संतानों के टिकट के लिए प्रयासरत हैं। रीता बहुगुणा जैसी नेता तो अपने बेटे के टिकट के लिए संसद की सदस्यता का बलिदान करने को तैयार हैं। मालूम हो कि भाजपा ने इस बार एक परिवार से केवल एक व्यक्ति को टिकट देने का निर्णय लिया है। प्रदर्शन के आधार पर कुछ विधायकों का टिकट भी कटना तय है। इसको भांपते हुए भाजपा के कुछ नेता पहले से ही अपना पैंतरा बदलने लगे हैं। अगले और कुछ दिनों तक सियासी समीकरण का बनने और टूटने का क्रम जारी रहेगा।