विकास की अंधी दौड़ में इंसानों ने पर्यावरण को तहस-नहस कर दिया है। अपने महत्वाकांक्षी प्रॉजेक्ट्स के लिए कई बार सरकार ने जंगलों का दोहन किया, नदियों को बांधा और लाखों पेड़ कटवा दिए। लेकिन ऐसे में कई बार अपने पर्यावरण के लिए खुद स्थानीय लोगों ने लड़ाइयां लड़ीं। आइए, आपको बताते हैं देश के 5 पर्यावरण आंदोलनों के बारे मेंः

बिश्नोई आंदोलनः 1730 में जोधपुर के राजा अभय सिंह ने महल बनवाने के लिए लकडç¸यों का इंतजाम करने के लिए अपने सैनिकों को भेजा। महाराज के सैनिक पेड़ काटने के लिए राजस्थान के खेजरी गांव में पहुंचे तो वहां की महिलाएं अपनी जान की परवाह किए बिना पेड़ों को बचाने के लिए आ गईं। विश्नोई समाज के लोग पेड़ों की पूजा करते थे। 

चिपको आंदोलनः यह आंदोलन 1973 में उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के चमोली जिले में शुरू हुआ और देखते-देखते पूरे उत्तराखंड में फैल गया। इसकी शुरुआत सुंदरलाल बहूगुणा ने की थी। उन्होंने लोगों को पेड़ों के महत्व के बारे में जागरूक किया जिसके बाद लोगों ने ठेकेदारों द्वारा कटवाए जा रहे पेड़ों को बचाने का प्रण लिया।

साइलेंट वैलीः केरल की साइलेंट वैली लगभग 89 वर्ग किलोमीटर में फैला जंगल है जहां कई खास प्रकार के पेड़-पौधे और फूल पाए जाते हैं। 1980 में सरकार ने कुंतिपुजा नदी के किनारे बिजली बनाने के लिए एक बांध बनाने का प्रस्ताव दिया। इससे लगभग 8.3 वर्ग किलोमीटर जंगल के डूब जाने का खतरा था। तब कई पर्यावरण प्रेमी, एनजीओ और स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया।

अप्पिको आंदोलनः कर्नाटक में हुए अप्पिको आंदोलन की खास बात यह है कि इसका कोई लीडर नहीं था। यह आंदोलन जंगलों को व्यवसायीकरण से बचाने के लिए था।

नर्मदा बचाओः मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात की प्रमुख नदी नर्मदा को बचाने के लिए शुरू हुए नर्मदा आंदोलन ने दुनिया भर में सुर्खियां बोटरी। इस आंदोलन की शुरुआत ऐक्टिविस्ट मेधा पाटेकर, बाबा आम्टे, आदिवासियों, किसानों और सोशल वर्कर्स ने मिलकर की थी। इसकी शुरुआत नर्मदा पर बन रहे सरदार सरोवर बांध से विस्थापित हुए लोगों की पुनर्वास की व्यवस्था करने के लिए हुई थी।