गुलाम चिश्ती

गुवाहाटी : पिछले कुछ दिनों से त्रिपुरा देश-विदेश की खबरों  में कुछ खास वजहों से छाया हुआ है। बांग्लादेश में दुर्गा पूजा के ऐन मौके पर जो सांप्रदायिक घटनाएं घटीं, उसका कुअसर भारत-बांग्लादेश के सीमावर्ती राज्य त्रिपुरा में भी देखा गया और देखते-देखते राज्य का कई हिस्सा सांप्रदायिकता की आग में जल उठा। दूसरी ओर ऐसी विषम परिस्थिति से उबरने के लिए राज्य सरकार की ओर से जो तरीके अपनाए गए,उसने आग में घी डालने का काम किया और त्रिपुरा यकायक सिर्फ राष्ट्रीय प्रचार माध्यमों में ही नहीं,बल्कि अतंर्राष्ट्रीय मीडिया में भी चर्चा का विषय बन गया। दूसरी ओर पश्चिम बंगाल में टीएमसी की ऐतिहासिक जीत के बाद पार्टी सुप्रीमो ममता बनर्जी ने अपना रुख त्रिपुरा की ओर कर दिया है। राजनीतिक रणनीतिकार प्रशंात किशोर की सक्रियता और ममता के भतीजे अभिषेक के अगरतला दौरे ने प्रदेश की भाजपा सरकार की नींद हराम कर दी है। हां,यहां के पूर्व मुख्यमंत्री माणिक सरकार की ईमानदारी की चर्चा अकसर होती रहती थी,परंतु मीडिया में उसे कोई खास स्पेश नहीं मिलता था। इसी बीच चालू महीने के शुरू में दिल्ली के जंतर मंतर में त्रिपुरा के करीब 1500 लोगों का एक जत्था,जिसमें अधिकांश ने रंग-बिरंगे पारंपरिक परिधान पहन रखे थे, इस माह के शुरू में त्रिपुरा के मूल निवासियों के लिए नए राज्य ग्रेटर टिपरालैंड की मांग को लेकर तीन दिवसीय धरने के लिए दिल्ली में जुटे। नए राज्य के लिए इस आंदोलन का नेतृत्व तिप्राहा स्वदेशी प्रगतिशील क्षेत्रीय गठबंधन (टीआईपीआरए, जिसे तिपरा मोथा भी कहा जाता है) और स्वदेशी पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) की तरफ से किया गया था। दिल्ली में इस धरने में कांग्रेस, शिवसेना और आम आदमी पार्टी (आप) के नेता भी पहुंचे, जिन्होंने कहा कि वे केंद्र सरकार से ग्रेटर टिपरालैंड के गठन पर गंभीरता से ‘विचार’ करने को कहेंगे। मूल निवासी त्रिपुरियों (जिन्हें तिप्रासा या टिपरा के नाम से भी जाना जाता है) के लिए अलग राज्य की मांग कोई नई बात नहीं है और इस बार आईपीएफटी की तरफ से उठाया जा चुका है। प्रस्तावित मॉडल में ग्रेटर टिपरालैंड में त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद (टीटीएएडीसी) के बाहर एक स्वदेशी क्षेत्र या गांव में रहने वाले प्रत्येक आदिवासी व्यक्ति को शामिल करना है। हालांकि, यह विचार केवल त्रिपुरा के आदिवासी परिषद क्षेत्रों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के विभिन्न राज्यों जैसे असम और मिजोरम आदि में फैले त्रिपुरा के टिप्रसा (टिप्रासा) को भी शामिल करना चाहता है। इसके अलावा टिपरलैंड स्टेट पार्टी और आईपीएफटी (टिपरा) को त्रिपुरा इंडिजिनस पीपल्स रिजनल अलायंस (टीआईपीआरए) में मिला दिया गया है। ऐसे में इस नई राजनीतिक मांग से पूर्वोत्तर राज्य में हड़कंप है। त्रिपुरा में हाल के वर्षों में त्रिपुरा नेशनल वालंटियर्स (टीएनवी),यूनाइटेड बंगाली लिबरेशन फ्रंट (यूबीएलएफ),नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी),ऑल त्रिपुरा टाइगर फोर्स (एटीटीएफ) जैसे विभिन्न अवैध विद्रोही संगठन त्रिपुरा में शांति बनाए हुए हैं। सिस्टम में रुकावट थी कि ये सभी संगठन विभिन्न जातीय और सामुदायिक आधार पर राज्य के विभाजन की मांग कर रहे थे। नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (एनएलएफटी), जिसका नेतृत्व विश्वमोहन देवबर्मा कर रहे हैं,वहां की एकमात्र सक्रिय शाखा है। आईपीएफटी का गठन 1990 में हुआ था, यह समूह अभी भी निष्कि्रय है। त्रिपुरा राष्ट्रीय स्वयंसेवकों टीएनवी ने 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ शांति समझौते के अनुसार हथियार को आत्मसमर्पण कर दिया था। स्वायत्त जिला परिषद (एडीसी) त्रिपुरा 7,132.56 वर्ग किमी में फैला है और लगभग 68 प्रतिशत भौगोलिक क्षेत्र को कवर करता है?  हालांकि, आदिवासी राज्य की 37 लाख लोगों की आबादी का एक तिहाई हिस्सा है। त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त परिषद (टीटीएएडीसी) के तहत 70 प्रतिशत भूमि पहाड़ियों और जंगलों से आच्छादित है और अधिकांश निवासी झूम खेती करते हैं। जनजातीय परिषद की 28 सीटों के अलावा, राज्य विधान सभा में 20 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी)के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं, जबकि जनजातीय मतदाता कम से कम 10 सीटों पर निर्णायक भूमिका निभाते हैं। गौरतलब है कि संविधान की छठी अनुसूची असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में प्रावधान है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 104 में अनुच्छेद 244 के तहत अनुसूचित और आदिवासी क्षेत्रों के प्रशासन के संबंध में प्रावधान किए गए हैं। इसी तरह पानी, जंगल और भूमि पर जनजातियों के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए ऐसा अधिनियम भी बनाया गया है। उल्लेखनीय है कि जब से इस संगठन ने राज्य में सत्तारूढ़ भाजपा के साथ गठबंधन किया,इन मांगों पर चुप्पी साध ली गई थी। अब त्रिपुरा के पूर्व शाही परिवार के वंशज और टिपरा मोथा के अध्यक्ष प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा ने यह मुद्दा फिर से उठाया है और इस आंदोलन का नया चेहरा बन गए हैं।