दिल्ली में हाल के दिनों में बढ़ी गुमशुदगी की घटनाओं ने केवल राजधानी ही नहीं,बल्कि पूरे देश की कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब एक ही महीने में सैकड़ों लोगों के लापता होने की खबरें सामने आती हैं और राष्ट्रीय स्तर पर लाखों लोगों के गुमशुदा होने के आंकड़े दर्ज होते हैं, तो यह मान लेना कठिन नहीं कि समस्या सामान्य प्रशासनिक चूक से कहीं अधिक गहरी है। यह एक ऐसा मानवीय और सामाजिक संकट है, जो शासन-प्रशासन की जवाबदेही, सुरक्षा तंत्र की क्षमता और समाज की सतर्कता- तीनों की परीक्षा ले रहा है। शीर्ष अदालत की ओर से इस मामले में हस्तक्षेप यह दर्शाता है कि स्थिति चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुकी है। अदालत ने केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या बच्चों और महिलाओं की लगातार गुमशुदगी के पीछे कोई संगठित, देशव्यापी गिरोह सक्रिय है। यह आशंका निराधार नहीं लगती, क्योंकि मानव तस्करी, बाल श्रम, जबरन विवाह और देह व्यापार जैसे अपराधों की जड़ें अक्सर संगठित नेटवर्क से जुड़ी पाई गई हैं। यदि देश के अलग-अलग राज्यों में गुमशुदगी के मामलों में समान पैटर्न उभर रहे हैं, तो यह एक बड़े आपराधिक गठजोड़ का संकेत हो सकता है। सबसे अधिक चिंता का विषय यह है कि राज्यवार विश्वसनीय और अद्यतन आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। जब सरकार के प्रतिनिधि स्वयं अदालत में स्वीकार करते हैं कि लापता बच्चों और उनसे जुड़े अभियोजन के अंतिम आंकड़े राज्यों से प्राप्त नहीं हुए हैं, तो यह तंत्र की गंभीर कमजोरी को उजागर करता है। किसी भी समस्या के समाधान की पहली शर्त है- उसका सही आकलन। यदि यह भी स्पष्ट न हो कि कितने लोग वापस लौटे और कितने अब भी लापता हैं, तो रणनीति कैसे बनेगी? दरअसल, आंकड़ों का अभाव केवल तकनीकी कमी नहीं, बल्कि संवेदनशीलता की कमी को भी दर्शाता है। हर गुमशुदा व्यक्ति के पीछे एक परिवार की पीड़ा, असुरक्षा और अनिश्चितता जुड़ी होती है। प्रशासनिक फाइलों में दर्ज एक संख्या, किसी घर की बुझी हुई आशा का प्रतीक होती है। ऐसे में आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर एक एकीकृृत, पारदर्शी और नियमित रूप से अद्यतन होने वाली राष्ट्रीय प्रणाली विकसित करें, जिसमें गुमशुदगी, बरामदगी और अभियोजन की पूरी जानकारी उपलब्ध हो। साथ ही, प्रत्येक राज्य में नोडल अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी स्पष्ट जवाबदेही तय की जानी चाहिए। केवल निर्देश जारी कर देना पर्याप्त नहीं है, उनके पालन की निगरानी भी उतनी ही आवश्यक है। पुलिस तंत्र को तकनीकी रूप से सशक्त बनाने, राज्यों के बीच समन्वय बढ़ाने और संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई की व्यवस्था विकसित करनी होगी। रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और सीमावर्ती क्षेत्रों में विशेष निगरानी अभियान चलाए जा सकते हैं। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा बनाए गए पोर्टल पर यदि नियमित रूप से आंकड़े दर्ज नहीं किये जा रहे हैं, तो यह भी गंभीर लापरवाही है। डिजिटल प्लेटफॉर्म तभी प्रभावी होते हैं, जब उनमें सटीक और समय पर जानकारी डाली जाए। इसके लिए राज्यों को बाध्यकारी दिशा-निर्देश और समय-सीमा तय करनी चाहिए। समाधान केवल सरकारी प्रयासों से ही नहीं आएगा। समाज को भी सजग बनाना होगा। स्कूलों, सामुदायिक केंद्रों और मीडिया के माध्यम से बच्चों की सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश व्यापक रूप से प्रसारित किए जाएं। अभिभावकों को सतर्क रहने, बच्चों को सुरक्षित व्यवहार सिखाने और संदिग्ध गतिविधियों की तुरंत सूचना देने के लिए प्रेरित किया जाए। गुमशुदगी का बढ़ता संकट केवल कानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि मानवाधिकार और सामाजिक न्याय का भी मुद्दा है। यदि शासन-प्रशासन इस चुनौती को गंभीरता से लेकर ठोस, समन्वित और जवाबदेह कार्रवाई करता है, तभी नागरिकों का भरोसा बहाल हो सकेगा। वरना आंकड़े बढ़ते रहेंगे और हर संख्या के पीछे छिपी मानवीय त्रासदी हमें बार-बार झकझोरती रहेगी। सवाल है कि सैकड़ों की संख्या में लोग कहां गायब हो गए। जब देश की राजधानी से इतनी बड़ी संख्या में लोग गायब हो रहे हैं तो अन्यत्र भी ऐसी घटनाएं घटी होंगी। लगता है कि सूचना के अभाव में देश के अन्य भागों से ऐसी खबरें कम आ रही हैं। विषय ङ्क्षचतनीय है। इसलिए इसे विषयांतर कर इसकी गंभीरता को कम आंकने की जरूरत नहीं है।
गुमशुदगी पर सवाल