इन दिनों देशभर में अवैध खनन एक संगठित अपराध के रूप में उभर कर सामने आया है। चाहे कोयले का खनन हो, बालू, रेत या पत्थर का- हर जगह स्थानीय माफिया का वर्चस्व दिखाई देता है, जिन्हें राजनीतिक संरक्षण, प्रशासनिक उदासीनता और कारोबारी स्वार्थों का खुला समर्थन प्राप्त है। यह अवैध गठजोड़ न केवल सरकारी राजस्व को चूना लगा रहा है, बल्कि पर्यावरण, मानव जीवन और आने वाली पीढिय़ों के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहा है। हाल ही में मेघालय की एक कोयला खदान में अवैध खनन के दौरान 27 लोगों की मौत ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। इस त्रासदी से भी अधिक चिंताजनक केंद्रीय खान मंत्री जयकिशन रेड्डी का यह बयान रहा कि मेघालय में अवैध खनन से सभी अवगत हैं। यदि वास्तव में सभी को इसकी जानकारी है, तो फिर यह सवाल स्वाभाविक है कि अब तक इस पर निर्णायक रोक क्यों नहीं लगाई जा सकी? क्या यह मान लिया जाए कि अवैध खनन से मिलने वाला सुविधा शुल्क सत्ता के गलियारों तक पहुंच रहा है? अवैध खनन का यह खेल केवल मेघालय तक सीमित नहीं है। बिहार की राजधानी पटना में बालू खनन माफिया की गुंडागर्दी समय-समय पर सुर्खियों में रहती है। पत्थर खनन के पीछे भी संगठित माफिया सक्रिय हैं। स्पष्ट है कि सत्ताधीशों की इच्छाशक्ति की कमी और प्रवर्तन एजेंसियों की लापरवाही ने इन माफियाओं के हौसले बुलंद कर रखे हैं। दुर्भाग्यवश, नागरिक समाज की उदासीनता भी इस समस्या को और गहराई प्रदान करती है। पंजाब के रोपड़ जिले की शिवालिक पहाडिय़ों में हो रही अंधाधुंध खुदाई इस भयावह स्थिति का जीवंत उदाहरण है। शिवालिक पर्वतमाला भू-संरचना की दृष्टि से अपेक्षाकृृत नई और स्वाभाविक रूप से अस्थिर है। यहां अनियंत्रित खनन से पारिस्थितिकीय तंत्र को अपूरणीय क्षति पहुंच रही है। भूजल पुनर्भरण, मृदा-स्थिरता और जैव-विविधता संरक्षण जैसे जीवन रक्षक प्राकृृतिक कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। इसका परिणाम भविष्य में भूस्खलन, बाढ़, जल संकट और गाद जमाव जैसी आपदाओं के रूप में सामने आ सकता है। विडंबना यह है कि प्रशासन की नाक के नीचे भारी मशीनों से रात के अंधेरे में खुलेआम खनन किया जा रहा है। पूरी पहाडिय़ोंं को समतल किया जा रहा है, जिससे प्राकृृतिक सुरक्षा कवच हमेशा के लिए नष्ट हो रहा है। अधिकारी अक्सर यह दलील देते हैं कि खनन कार्य पर्यावरणीय स्वीकृृतियों के आधार पर हो रहा है और उल्लंघन पर जुर्माना लगाया जाता है। किंतु स्थानीय लोगों के आरोप हैं कि खनन तय सीमा से कहीं अधिक और बड़े पैमाने पर हो रहा है, इन दावों की पोल खोल देते हैं। वास्तव में समस्या नियम-कानूनों की कमी की नहीं, बल्कि उनके प्रवर्तन की है। जब निगरानी जमीनी स्तर पर होने के बजाए केवल कागजों तक सीमित रह जाती है तो अवैध गतिविधियों को खुला संरक्षण मिलता है। ठेकेदारों को आपराधिक तत्वों और राजनेताओं का संरक्षण मिलना इस संकट को और गंभीर बनाता है। यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब सर्वोच्च न्यायालय और राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण बार-बार स्पष्ट कर चुके हैं कि आर्थिक गतिविधियां पर्यावरण की कीमत पर नहीं चल सकतीं। आज आवश्यकता है कि अवैध खनन को केवल जुर्माने का विषय न मानकर गंभीर पर्यावरणीय अपराध के रूप में देखा जाए। प्रतिबंधित क्षेत्रों का सख्त सीमांकन, ड्रोन और सेटेलाइट जैसी प्रौद्योगिकी आधारित निगरानी, दोषी अधिकारियों की जवाबदेही तय करना और राजनीतिक संरक्षण पर कठोर प्रहार- ये सभी कदम अब टाले नहीं जा सकते। अन्यथा, विकास के नाम पर किया जा रहा यह विनाश आने वाले समय में एक ऐसी आपदा का रूप ले सकता है, जिसकी भरपाई असंभव होगी।