आज की दुनिया अस्थिर भू-राजनीतिक परिस्थितियों से गुजर रही है। यूक्रेन-रूस युद्ध, मिडिल ईस्ट में तनाव, चीन-अमरीका प्रतिस्पर्धा और सप्लाई चेन में बार-बार आने वाले झटकों ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को अनिश्चित बना दिया है। ऐसे माहौल में भारत जैसे उभरते देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती है- रोजगार, ग्रोथ और स्थिरता के बीच संतुलन बनाना। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की ओर से पेश किया गया बजट इसी संतुलन को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। इस बजट की सबसे अहम प्राथमिकता रोजगार सृजन है और इसी कारण मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को केंद्र में रखा गया है। सरकार का लक्ष्य जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का योगदान 25 प्रतिशत तक ले जाना है, हालांकि यह सच है कि अभी तक 20 प्रतिशत का लक्ष्य भी हासिल नहीं हो सका है। इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए बजट में छह प्रायोरिटी सेक्टर्स तय किए गए हैं, जिनमें सेमीकंडक्टर, बायोफार्मा, टेक्सटाइल, एमएसएमई और अर्बन इकॉनामिक क्लस्टर्स जैसे क्षेत्र शामिल हैं। ये सभी सेक्टर न सिर्फ  रोजगार पैदा करने की क्षमता रखते हैं, बल्कि भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में मजबूत स्थिति भी दिला सकते हैं। सरकार का स्पष्ट फोकस डोमेस्टिक इकॉनामी को मजबूत करने पर है, ताकि बाहरी झटकों का असर सीमित रहे। डेयरी, फिशरीज और एग्रीकल्चर-आधारित रोजगार को बढ़ावा देने के लिए किये गए उपाय ग्रामीण आय बढ़ाने में मददगार साबित हो सकते हैं। इससे कंजम्पशन को भी सहारा मिलेगा, जो भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इंफ्रास्ट्रक्चर पर सरकार का भरोसा इस बजट में भी बरकरार रहा है। वित्त वर्ष 2027 में कैपिटल एक्सपेंडिचर को 10 प्रतिशत बढ़ाकर 12.2 लाख करोड़ रुपए करने का ऐलान इस बात का संकेत है कि सरकार निजी निवेश की सुस्ती के बीच खुद आगे बढक़र ग्रोथ को थामे रखना चाहती है। पिछले कई वर्षों से जिस प्राइवेट इन्वेस्टमेंट बूम की उम्मीद की जा रही थी, वह अब तक पूरी तरह साकार नहीं हो सकी है। ऐसे में इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश ही ग्रोथ का सबसे भरोसेमंद इंजन बना हुआ है। बजट का एक अहम रणनीतिक पहलू क्रिटिकल मिनरल्स और रेयर अर्थ से जुड़े सेग्मेंट्स को बढ़ावा देना है। हाल ही में चीन की ओर से रेयर अर्थ मैग्नेट्स की सप्लाई रोकने की घटनाओं ने दुनिया को यह एहसास दिलाया है कि आर्थिक निर्भरता भी एक बड़ा भू-राजनीतिक हथियार बन सकती है। इस संदर्भ में भारत की यह पहल दूरदर्शी कही जा सकती है। इसके साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा और क्लाउड सर्विसेज जैसे क्षेत्रों पर फोकस भारत को भविष्य की टेक्नोलॉजी-ड्रिवन इकॉनामी के लिए तैयार करता है। मैक्रो इकॉनामिक फ्रंट पर सरकार ने ग्रोथ और फिस्कल डिसिप्लिन- दोनों को साधने की कोशिश की है। वित्त वर्ष 2026 में 7.4 प्रतिशत की अनुमानित जीडीपी ग्रोथ और 2027 में 7 प्रतिशत का अनुमान वैश्विक माहौल को देखते हुए मजबूत आंकड़े हैं। वहीं फिस्कल डेफिसिट को 4.4 प्रतिशत से घटाकर 4.3 प्रतिशत करने का लक्ष्य भारत की सॉवरेन रेटिंग के लिहाज से सकारात्मक संकेत देता है। हालांकि शेयर बाजार की प्रतिक्रिया निराशाजनक रही है। विदेशी निवेशकों की लगातार बिकवाली, फ्यूचर्स-ऑप्शंस पर एसटीटी में 150 प्रतिशत की बढ़ोतरी और बायबैक टैक्स से जुड़े सवाल बाजार की चिंता बढ़ाते हैं। घरेलू निवेशकों ने फिलहाल बाजार को संभाला है, लेकिन उनका भरोसा कब तक बना रहेगा, यह देखना अहम होगा। कुल मिलाकर यह बजट किसी बिग बैंग घोषणा का नहीं, बल्कि स्थिर, संतुलित और दीर्घकालिक सोच का बजट है। रोजगार, मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर और फिस्कल अनुशासन- इन चार स्तंभों पर खड़ा यह बजट बताता है कि मौजूदा वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने जल्दबाजी नहीं, बल्कि सही दिशा में कदम बढ़ाने का रास्ता चुना है।