फिलहाल भारतीय राजनीति के परिदृश्य पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दबदबा स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। देश के लगभग हर हिस्से में भाजपा लगातार चुनावी सफलता हासिल कर रही है और महाराष्ट्र के हालिया नगर निकाय चुनावों ने इस रुझान को और मजबूत कर दिया है। इन चुनावों में भाजपा के नेतृत्व वाले महायुति गठबंधन ने न केवल सत्ता पक्ष के रूप में अपनी स्थिति मजबूत की, बल्कि विपक्ष, विशेषकर कांग्रेस को एक बार फिर हाशिए पर धकेल दिया। महाराष्ट्र में विधानसभा चुनावों में शानदार जीत के एक वर्ष से कुछ अधिक समय बाद स्थानीय निकाय चुनावों में मिली यह सफलता इस बात का संकेत है कि राज्य की राजनीति में दीर्घकालिक बदलाव की नींव पड़ चुकी है। यह बदलाव केवल सत्ता समीकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों में राज्य की राजनीतिक धारा और विचारधारा की दिशा भी तय करेगा। इस चुनाव का सबसे बड़ा और प्रतीकात्मक परिणाम बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) में देखने को मिला। दशकों तक शिवसेना के वर्चस्व वाला यह नगर निगम अब भाजपा के लिए एक बड़ी राजनीतिक उपलब्धि बन गया है। बीएमसी में भाजपा का सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरना केवल चुनावी जीत नहीं, बल्कि मुंबई की सत्ता संरचना में निर्णायक बदलाव का संकेत है। अविभाजित शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे के समय से जिस मुंबई पर ठाकरे परिवार का राजनीतिक प्रभाव रहा, अब वहां भाजपा के नेतृत्व वाला एकनाथ शिंदे गुट निर्णायक भूमिका में नजर आएगा। बीएमसी का महत्व केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि आर्थिक भी है। 2025-26 के लिए लगभग 74,427 करोड़ रुपये का बजट रखने वाला बीएमसी देश का सबसे धनी नगर निगम है। इसका बजट कई राज्यों—जैसे हिमाचल प्रदेश और गोवा—से भी अधिक है। ऐसे में इस निकाय पर नियंत्रण का अर्थ है विकास योजनाओं, शहरी बुनियादी ढांचे और नीति-निर्धारण पर व्यापक प्रभाव। यही कारण है कि बीएमसी चुनावों के परिणाम महाराष्ट्र की राजनीति में दूरगामी असर डालते हैं। इस चुनाव में विपक्ष की एकता भी भाजपा की रफ्तार रोकने में नाकाम रही। दो दशकों बाद ठाकरे भाइयों—उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे—की पार्टियों का एक साथ आना मतदाताओं को खास आकर्षित नहीं कर सका। 'मराठी मानुषÓ का भावनात्मक मुद्दा इस बार विकास की आकांक्षाओं के सामने फीका पड़ गया। वहीं, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के शरद पवार और अजीत पवार गुटों का समीकरण भी पुणे जैसे अहम क्षेत्र में विफल साबित हुआ। जनता का यह फैसला स्पष्ट करता है कि मतदाता अब क्षेत्रीय संकीर्णता या पारंपरिक भावनात्मक नारों से आगे बढ़कर स्थिर सरकार और विकास के वादों को प्राथमिकता दे रहे हैं। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व और भाजपा के विकास एजेंडे को इस चुनाव में स्पष्ट समर्थन मिला है। दूसरी ओर कांग्रेस के लिए यह परिणाम गंभीर आत्ममंथन का अवसर है। लगातार चुनावी हार और घटती प्रासंगिकता यह संकेत देती है कि पार्टी को अपनी रणनीति, नेतृत्व और जमीनी संगठन पर नए सिरे से काम करना होगा। यही स्थिति पूरे विपक्ष, विशेषकर महा विकास अघाड़ी गठबंधन, के लिए भी है, जिसके भविष्य पर अब प्रश्नचिह्न लग गया है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा अब चुनाव जीतने की कला में पारंगत हो चुकी है। मजबूत बूथ प्रबंधन, संगठित कैडर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का समर्थन उसकी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा है। यही कारण है कि भाजपा न केवल अपने विरोधियों, बल्कि कई बार अपने सहयोगियों से भी आगे निकलती दिखाई देती है। कुल मिलाकर महाराष्ट्र के स्थानीय निकाय चुनावों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश कर चुकी है। भाजपा और उसके सहयोगी जहां जीत का सिलसिला कायम रखे हुए हैं, वहीं कांग्रेस और विपक्ष को अपनी दिशा और दशा पर गंभीरता से पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। यदि विपक्ष समय रहते अपनी रणनीति नहीं बदलता, तो आने वाले चुनावों में राजनीतिक इतिहास रचने का अवसर केवल भाजपा के पास ही रह जाएगा।