बांग्लादेश में 12 फरवरी को संसदीय चुनाव की घोषणा की गई है। चुनाव का शंखनाद होने के साथ ही राजनीतिक पाॢटयां सक्रिय हो गई हैं। इस चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) सबसे बड़ी जीत की दावेदार मानी जा रही है। बीएनपी के कार्यकारी अध्यक्ष तारिक रहमान 17 वर्ष बाद बांग्लादेश की सरजमीं पर लौटे हैं। पूर्व प्रधानमंत्री स्व. खालिदा जिया के पुत्र तारिक ने बांग्लादेश पहुंचने के साथ ही वहां की मिट्टी को नमन किया तथा वहां रहने वाले सभी समुदाय के लोगों को सुरक्षा देने की बात कही। दूसरी तरफ नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) ने भी चुनाव लडऩे की घोषणा की है, लेकिन एनसीपी ने चुनाव जीतने के लिए पाक समॢथत जमियत उलेमा के साथ चुनावी तालमेल किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि एनसीपी के कई वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ दिये हैं। जमियत उलेमा शुरू से पाकिस्तान समर्थक रहा है। 1971 के युद्ध में जमियत उलेमा ने पाकिस्तानी सेना का साथ दिया था। अगर एनसीपी का गठबंधन सत्ता में आ जाता है तो वह भारत के लिए बड़ा खतरा होगा। बांग्लादेश में शुरू हुए छात्र आंदोलन को जमियत ने ही कट्टरपंथियों का आंदोलन बना दिया। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार नहीं चाहती है कि समय पर चुनाव हो। अगर चुनाव शांतिपूर्ण संपूर्ण हो जाता है तो मोहम्मद यूनुस को गद्दी छोडऩी पड़ेगी। यही कारण है कि यूनुस की चुनाव में कोई दिलचस्पी नहीं है। यूनुस सरकार ने पहले ही बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना तथा उनकी पार्टी पर चुनाव लडऩे का प्रतिबंध लगा रखा है। बांग्लादेश में शेख हसीना की पार्टी अवामी लीग का अच्छा-खासा प्रभाव है। यही कारण है कि कट्टरपंथी अवामी लीग को चुनाव लडऩे से रोकना चाहते हैं। भारत सरकार ने पर्दे के पीछे बीएनपी के नेता तारिक रहमान से बातचीत शुरू कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी द्वारा खालिदा जिया के स्वास्थ्य के बारे में हालचाल पूछना तथा उनकी मृत्यु पर आयोजित जनाजे में विदेश मंत्री एस जयशंकर को भेजना, किसी को समझ में नहीं आ रहा है। जयशंकर ने तारिक रहमान के साथ-साथ ऐसे कुछ नेताओं से बातचीत की है जिनका झुकाव भारत की तरफ है। पर्दे के पीछे बड़ी कूटनीतिक पहल चल रही है। पाकिस्तान तथा चीन अपनी गतिविधियों से बांग्लादेश की मदद कर रहा है। भारत सरकार को इसके प्रति सतर्क रहना पड़ेगा। चीन और पाकिस्तान लगातार बांग्लादेश को धमकाने में लगे हैं। अमरीका भी पर्दे के पीछे से कार्रवाई करने से बाज नहीं आता। बांग्लादेश से पहले श्रीलंका में ऐसी ही घटनाएं हो चुकी हैं। उस वक्त भारत ने आगे बढक़र श्रीलंका की मदद की थी। फिर चुनाव में गोटाबाया राजपक्षे की सत्ता का सफाया हो गया। उसके बाद बांग्लादेश में छात्र नेताओं ने आंदोलन किया जिसका खामियाजा शेख हसीना को सत्ता छोडक़र भुगतना पड़ा। शेख हसीना फिलहाल भारत में निर्वासित जीवन बिता रही है। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बावजूद अभी भी बांग्लादेश में आंदोलन चल रहा है। बांग्लादेशी कट्टरपंथी ङ्क्षहदुओं को निशाना बना रहे हैं तथा उनकी संपत्ति नष्ट कर रहे हैं। अभी भी बांग्लादेश में कट्टरपंथियों का खुलेआम तांडव चल रहा है। नेपाल में भी केपी शर्मा ओली की सरकार के खिलाफ जबर्दस्त आंदोलन हुआ। केपी शर्मा ओली को सत्ता छोडऩा पड़ा। वर्तमान में नेपाल के सुप्रीम कोर्ट की पूर्व न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार काम कर रही है। नेपाल में भी मार्च में चुनाव होने वाले हैं। नेपाल के चुनाव का भी भारत पर काफी असर पड़ेगा। बांग्लादेश और नेपाल के चुनाव से सीधे भारत का संबंध है। अगर दोनों देशों में भारत विरोधी सरकार आती है तो उससे भारत का सिरदर्द बढ़ेगा। कनाडा में भी भारत विरोधी सरकार का पतन हुआ है तथा नई सरकार का गठन हुआ जो भारत के प्रति सकारात्मक सोच रखती है। कुल मिलाकर नए वर्ष में भी भारत को आस-पड़ोस की राजनीति पर पैनी नजर रखनी होगी।
बांग्लादेश चुनाव का भारत पर असर