एयरलाइन इंडिगो में अचानक एक बड़ी संकट दिखी, जिसके कारण  हवाई यात्रियों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। हजारों उड़ानें रद्द हुईं। देश के कई एयरपोर्ट पर त्राहि- त्राहि का आलम दिखा। लंबी कतारें लगीं और परेशान लोग इंडिगो के स्टाफ से सवाल-जवाब करते दिखे। कहीं शादी अटक गई तो किसी को अपने ही रिसेप्शन में वीडियो कॉल के जरिए शामिल होना पड़ा। किसी का इंटरव्यू छूट गया तो किसी की छुट्टियों की योजना चौपट हो गईं। इस दौरान चार हजार रुपए की टिकटें 20 हजार रुपए तक में बिकती भी नजर आईं।  हालांकि इन सबके बीच इंडिगो ने माफी मांगी और इस संकट से गंभीर रूप से प्रभावित हुए लोगों को ट्रैवल वाउचर देने की बात कही। इन सब के साथ ही इंडिगो को लेकर कई अहम सवाल भी सामने आए। आखिर इस तरह की स्थिति का आभास पहले से क्यों नहीं हुआ? इंडिगो के इस संकट ने सिस्टम की किन खामियों को उजागर किया? इंडिगो में उत्पन्न संकट उस बड़ी उथल-पुथल को दर्शाता है जो कंपनी क्षेत्र में बड़ी समस्याओं का कारण रही है। किंगफिशर एयरलाइंस से लेकर इंफ्रास्ट्रक्चर लीजिंग ऐंड फाइनेंशियल सर्विसेज लिमिटेड (आईएलएफएसएल) तक में मचे बवाल की जड़ भी इसी से जुड़ी हुई है। इनमें कई स्तरों (कार्यकारी प्रबंधन और निदेशकमंडल के साथ-साथ क्षेत्रीय नियामक) पर सामूहिक विफलता खुलकर सामने आई है। इससे भारतीय कंपनी संचालन ढांचे में व्याप्त खामियां उजागर होती हैं। इंडिगो ने समय-सीमा के पालन के दबाव और ऊंची लागत से जूझते विमानन क्षेत्र में ऊंची उड़ान भरी और मुनाफा भी खूब कमाया। मौजूदा संकट शुरू होने से पहले कंपनी प्रतिदिन 700 गंतव्यों के लिए 2,700 से अधिक उड़ानें संचालित करती थी। अन्य अधिसूचित विमानन कंपनियों के साथ इंडिगो को भी पिछले साल जनवरी में नागर विमानन महानिदेशालय (डीजीसीए) की ओर से अधिसूचित उन्नत उड़ान कार्य समय सीमा (एफडीटीएल) नियमों के अनुरूप पायलट भर्ती कार्यक्रम संचालित करने के लिए एक वर्ष से अधिक समय मिला था। परिचालन के लिहाज से नए एफडीटीएल नियम वर्ष 2025 में किसी भी विमानन कंपनी के लिए एक महत्वपूर्ण निर्देश थे जिनके साथ तालमेल बैठाना उसके लिए अनिवार्य था। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार इंडिगो की 2023-24 और 2024-25 की सालाना रिपोर्ट में नए नियमों का कहीं उल्लेख नहीं था। न ही ये नियम इस विमानन कंपनी की जोखिम प्रबंधन रिपोर्ट में ही शामिल थे। इसका सीधा मतलब तो यही निकाला जा सकता है कि इंडिगो इन नए नियमों से उत्पन्न होने वाली परिचालन चुनौतियों का अंदाजा नहीं लगा पाई और न ही उनके लिए पर्याप्त रूप से तैयारी ही की। इस पूरे प्रकरण से इंडिगो की बुनियादी कार्य क्षमताओं पर सवाल उठता है। इस विफलता से व्यापार एवं उद्योग जगत की नामी हस्तियों वाले इंडिगो बोर्ड की भूमिका पर भी गंभीर सवाल उठते हैं। इंडिगो के बोर्ड में भारतीय वायु सेना के एक पूर्व प्रमुख, अमरीकी संघीय विमानन प्रशासन के एक पूर्व प्रमुख, एक अमरीकी विमानन कंपनी के वर्तमान मुख्य परिचालन अधिकारी, सेल के एक पूर्व मुख्य कार्याधिकारी और भारतीय प्रतिभूति बाजार नियामक (सेबी) के पूर्व अध्यक्ष जैसी बड़ी हस्तियां शामिल हैं। इंडिगो का कहना है कि उसके बोर्ड ने संकट शुरू होने के दिन से ही पूरे घटनाक्रम की निगरानी के लिए एक संकट प्रबंधन समूह का गठन किया। मगर आश्चर्य की बात यह है कि बड़े सुरमाओं खासकर विमानन उद्योग से ताल्लुक रखने वाले लोगों से खचाखच भरे कंपनी के बोर्ड ने अपने कर्तव्यों का पालन करने और संकट शुरू होने से पहले नए एफडीटीएल नियमों को लेकर प्रबंधन की योजनाओं पर सवाल उठाने की जहमत नहीं की। इंडिगो संकट डीजीसीए को भी कटघड़े में खड़ा करता है। ऐसी खबरें हैं कि सरकार इस विमानन कंपनी के बोर्ड का पुनर्गठन चाह रही है जो लगातार कई दिनों से चले आ रहे विमानन क्षेत्र में इस संकट के प्रति उसकी चिंता को दर्शाती है। संसद में नागर विमानन मंत्री ने कहा कि डीजीसीए इस बात की निगरानी कर रहा था कि विमानन कंपनियां नए एफडीटीएल नियमों का अनुपालन कर रही हैं या नहीं। मंत्री ने कहा कि 1 दिसंबर तक भी इंडिगो ने कोई मुद्दा नहीं उठाया था। यह पूरा घटनाक्रम इंडिगो की तरफ से सरासर धोखाधड़ी दर्शाता है जिसके लिए उसके खिलाफ तत्काल दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। मगर नियामक को नवंबर की शुरुआत में ही इंडिगो के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए थी जब उसने 1,200 से अधिक उड़ानें रद्द कर दी थीं। उड़ान संचालन में स्थिरता लाने के लिए इंडिगो को कुछ उड़ानें रोकने के लिए कहने के बजाए नियामक ने उसे कुछ नए मानदंडों से रियायत देकर सीईओ को ‘कारण बताओ’ नोटिस भेज दिया जो महज खानापूर्ति ही मानी जा सकती है।