इंडिगो को हाल ही में नई पायलट रोस्टरिंग नीतियों के चलते बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द करनी पड़ीं। इससे न केवल यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा बल्कि भारतीय विमानन क्षेत्र के मानव संसाधन प्रबंधन पर भी कई चुभते सवाल उठ खड़े हुए। यह विडंबना ही है कि देश का सबसे बड़ा निजी एयरलाइन समूह, जो स्वयं को दक्षता का प्रतीक मानता है, वही इस संक्रमण काल में सबसे अधिक असहज दिख रहा है। दरअसल, मानव संसाधन प्रबंधन किसी भी विमानन कंपनी के संचालन का केंद्र है। सुरक्षित और समयबद्ध उड़ानें तभी संभव हैं जब पायलटों, केबिन क्रू और संचालन से जुड़े कर्मचारियों का रोस्टर सुव्यवस्थित और उनकी थकान को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए। डीजीसीए की ओर से  जनवरी 2024 में नई रोस्टरिंग गाइडलाइंस-फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन की अधिसूचना इसी उद्देश्य से जारी की गई थी। विमानन कंपनियों को जून 2024 तक इन नियमों को अपनाने का समय दिया गया, जिसे बाद में बढ़ाकर जुलाई और नवंबर 2025 दो चरणों में लागू करने की अनुमति मिली। इसका अर्थ यह हुआ कि सभी एयरलाइंस को लगभग एक वर्ष से अधिक की तैयारी अवधि उपलब्ध थी। एफडीटीएल नियमों का मूल उद्देश्य पायलटों की थकान को कम करना और उड़ानों की सुरक्षा बढ़ाना है। वैश्विक अध्ययनों में यह सामने आता रहा है कि विमान दुर्घटनाओं में लगभग 20 प्रतिशत मामलों में पायलटों की थकान एक महत्वपूर्ण कारण रही है। नए नियमों के तहत सप्ताह में 48 घंटे आराम, रात में केवल दो लैंडिंग की अनुमति, लगातार ड्यूटी के समय में कमी, उड़ान समय से अधिकतम एक घंटे का 'एक्सटेंशनÓ, तथा लंबी दूरी की उड़ानों के बीच 24 घंटे का विश्राम अनिवार्य किया गया है। ये सभी प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय नागर विमानन संगठन के श्रेष्ठ मानकों के अनुरूप हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि जब अन्य एयरलाइनों को बड़े पैमाने पर संकट का सामना नहीं करना पड़ा तो इंडिगो ही क्यों डगमगा गई? फेडरेशन ऑफ इंडियन पायलट्स का आरोप है कि कंपनी ने वर्षों से भर्ती रोक रखी थी, जिससे न्यूनतम मानव संसाधनों पर निर्भर संचालन ही आगे चलकर बोझ बन गया। उनके अनुसार जब तक एयरलाइंस के पास पर्याप्त क्रू और पायलट न हों, तब तक डीजीसीए को मौसमी उड़ान कार्यक्रमों की मंजूरी नहीं देनी चाहिए। यह तर्क अपनी जगह वाजिब प्रतीत होता है, क्योंकि अचानक लागू हुए नियम नहीं थे-कंपनियों को पहले से तैयारी का पर्याप्त अवसर मिला था। हालांकि, कंपनियां अपनी दलील दे सकती हैं कि उड़ान प्रशिक्षण संस्थानों से निकलने वाले पायलटों की गुणवत्ता तेज भर्ती में बाधा बनती है। इस वर्ष डीजीसीए की ओर से  जारी रैंकिंग में कोई भी संस्थान  ए+ ए श्रेणी में नहीं पहुंचा, अधिकांश बी तथा सी श्रेणी में रहे। यदि पायलटों की गुणवत्ता ही असंगत है, तो एयरलाइंस के लिए लगातार और बड़े पैमाने पर भर्ती करना जोखिमपूर्ण और महंगा दोनों हो जाता है। प्रशिक्षित पायलटों की कमी का आर्थिक बोझ विदेशी पायलटों को नियुक्त करने पर और बढ़ जाता है। इसी के बीच भारत का विमानन बाजार तेजी से विस्तार के दौर में है। इंडिगो 1,000 से अधिक नए विमानों की खरीदी प्रक्रिया में है, जबकि एयर इंडिया लगभग 500 विमानों का ऑर्डर दे रही है। क्षेत्रीय एयरलाइंस भी अपने बेड़े का विस्तार कर रही हैं। इस संदर्भ में निकट भविष्य में 20,000 से अधिक नए पायलटों की मांग का अनुमान है। यदि मानव संसाधन संबंधी रणनीति अभी से मजबूत नहीं की गई तो यह मांग-आपूर्ति असंतुलन और भी तीखा हो सकता है। निस्संदेह, मौजूदा संकट केवल एक एयरलाइन की असफलता नहीं, बल्कि पूरे विमानन तंत्र के लिए चेतावनी है। बेहतर प्रशिक्षण अवसंरचना, गुणवत्ता नियंत्रण, समयबद्ध भर्ती और मानव संसाधन योजना-ये चार स्तंभ भारत के उभरते हुए विमानन उद्योग को टिकाऊ बनाए रख सकते हैं। यदि हम अपनी उड़ानों को सुरक्षित, समयबद्ध और विस्तारशील रखना चाहते हैं, तो मानव संसाधन प्रबंधन को रनवे नहीं-उड़ान का केंद्र बनाना ही होगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि इंडिगो का संकट आज की विमानन कंपनियों के लिए एक संदेश है। यदि नियम के तहत पायलटों से कार्य नहीं कराए जाएंगे तो ऐसे संकट बार-बार आएंगे। इस संकट ने मानवीय पक्ष को उजागर किया है। शिलांग की एक महिला कोलकाता जाने वाली थी, जहां उसके पति का निधन हो गया था। परंतु इस संकट के कारण वह अपने गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच सकी। ऐसे बहुत सारे यात्री हैं, जो आपातकाल स्थिति में अपने गंतव्य तक पहुंचना चाहते थे, परंतु पहुंच नहीं सके। इसके लिए इंडिगो प्रबंधन जिम्मेवार है। साथ ही हम सरकार को भी क्लीन-चिट नहीं दे सकते। इंडिगो की लापरवाही के कारण जो भी हुआ वह सही नहीं था। ऐसे में सरकार को सख्ती बरतने की जरूरत है ताकि भविष्य में इस तरह की त्रासदी न देखी जा सके।