इस वर्ष डॉलर के मुकाबले रुपए में 5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। 3 दिसंबर को रुपया 90 के आंकड़ा भी पार कर गया था। डॉलर के मुकाबले रुपया 90.15 तक पहुंच गया था। भारतीय रिजर्व बैंक के हस्तक्षेप के बाद भी रुपए की कीमत में 0.19 का ही सुधार हुआ है। 4 दिसंबर को रुपए की कीमत 89.96 हुई है। इस सप्ताह रुपए की कीमत 90 के स्तर के पार करने से भारतीय मुद्रा के नए संतुलन की ओर बढऩे के संकेत के रूप में देखा जा सकता है। आॢथक विशेषज्ञों के अनुसार भारत-अमरीका व्यापार समझौते की घोषणा में देरी, कमजोर पोर्टफोलियो निवेश और विनिर्माण-निर्यात को बढ़ावा देने की कोशिश भी रुपए पर दबाव डाल रही है। बाजार की कमजोर स्थिति को देखते हुए विदेश निवेशकों द्वारा निकासी जारी रखने एवं व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता के कारण रुपए का अवमूल्यन हो रहा है। रुपए में आई गिरावट से निर्यातकों एवं सूचना प्रौद्योगिकी उद्योग को कुछ फायदा होगा, लेकिन आयात महंगा होने से मुद्रा स्फीति बढऩे का खतरा भी हो जाएगा। रुपए की कीमत में आई गिरावट से घरेलू अर्थ व्यवस्था पर मिलाजुला असर पडऩे का अनुमान है। लेकिन सरकार पर राजनीतिक दबाव जरूर बढ़ गया है। विपक्षी सदस्यों ने संसद के अंदर और बाहर इस मामले को प्रमुखता से उठाया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडग़े ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को इस मुद्दे पर कटघरे में खड़ा किया है। रुपए का कमजोर होना देश की आर्थिक स्थिति के लिए अच्छा संकेत नहीं है। इससे आम आदमी को भी काफी मुश्किल का सामना करना पड़ेगा। पिछले कुछ महीनों से विदेशी निवेशकों का भारतीय बाजार से विश्वास घटा है। इस साल अब तक भारतीय शेयरों में अब तक 17 अरब डॉलर की शुद्ध बिकवाली हुई है, जिससे भारतीय बाजार पर भारी दबाव बना हुआ है। अमरीका के भारी शुल्क सोने के आयात में तेज उछाल ने अक्तूबर में भारत का माल व्यापार घाटा रिकार्ड स्तर पर पहुंचा दिया है। इस दौरान भारतीय कंपनियों के विदेशी कर्ज और एनआरआई जमाओं से मिलने वाले डॉलर प्रवाह भी धीमे पड़ गए हैं। अमरीकी टैरिफ के बीच निर्यातक ज्यादा सतर्कता दिखा रहे हैं। पूंजी प्रवाह कमजोर रहने से रुपया असंतुलित और असुरक्षित हो रहा है। भारत-अमरीकी व्यापार वार्ता में देरी को लेकर व्यापार जगत में अनिश्चितता का माहौल है, जिसका दबाव आरबीआई पर पड़ रहा है। आरबीआई ने बीच बीच में गिरावट की रफ्तार रोकने के लिए बाजार में दखल देता रहा है। इसी का नतीजा है कि रुपया 90.15 से 0.19 अंक सुधर कर 89.96 हुआ है। आयातकों की हेङ्क्षजग और लगातार हो रहे डॉलर आउट फ्लो के कारण मांग इतनी अधिक है कि मुद्रा पर दबाव बना हुआ है। हेङ्क्षजग एक वित्तीय रणनीति है, जिसका उपयोग निवेशक बाजार की अस्थिरता से होने वाले संभावित नुकसान कम करने के लिए करते हैं। पिछली तिमाही में भारत की जीडीपी 8.2 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ी, जो एक रिकॉर्ड है। सरकार के अनुसार यह वृद्धि अनुमान से बहुत ज्यादा है। इसके बावजूद पिछले कुछ दिनों से शेयर बाजार उतार-चढ़ाव के दौर से गुजर रहा है। जिससे भारतीय निवेशक परेशान दिख रहे हैं। रुपए का अवमूल्यन भी ङ्क्षचता का विषय है। मोदी सरकार को इस बारे में गंभीरता से सोचना होगा। अमरीका की भारी टैरिफ के बाद भारतीय व्यापार को जो नुकसान हो रहा है उसकी भरपाई के लिए नए विकल्प तलाशने होंगे। सरकार ने इस दिशा में पहल भी शुरू की है, ङ्क्षकतु रिजल्ट आने में थोड़ा वक्त लगेगा।
कमजोर होता रुपया