कहते हैं कि राजनीति में कोई स्थायी मित्र या शत्रु नहीं होता और शायद सबसे बड़े राजनीतिक परिवार भी इस कड़वे सत्य से बच नहीं पाते। सत्ता, प्रतिष्ठा, रणनीति और वर्चस्व की इस जंग में कई बार भावनाएं, खून के रिश्ते और त्याग भी सियासी गणित के सामने गौण हो जाते हैं। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य का हालिया आरोप और उनका भावनात्मक बयान इसी सच्चाई को फिर से सबके सामने रखता है। जिसने पिता को जीवन वापस देने के लिए अपना अंग तक दान किया, वही आज कहने पर मजबूर है कि मेरा कोई परिवार नहीं है और मुझे चप्पल मारकर घर से निकाल दिया गया। यह सिर्फ एक व्यक्ति या एक परिवार का भावनात्मक संकट नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृृति का दर्पण है जहां रिश्ते भी पब्लिक स्टेटमेंट, सोशल मीडिया पोस्ट और सत्ता समीकरणों के बीच तौले जाते हैं। रोहिणी आचार्य का त्याग सिर्फ परिवार की बात नहीं थी, बल्कि उस समय पूरे देश ने इसे मानवीय मूल्यों की मिसाल के रूप में देखा था। भाजपा के वरिष्ठ नेता गिरिराज सिंह से लेकर तमाम विपक्षी और समर्थक दलों ने उनकी जमकर सराहना की थी। लेकिन आज वही रोहिणी खुद को राजनीतिक और पारिवारिक दोनों मोर्चों पर अकेला पा रही हैं। तेजस्वी यादव पर लगाए गए उनके आरोपों ने यह तो स्पष्ट कर दिया कि राजद परिवार सिर्फ चुनावी हार से नहीं, बल्कि भीतरी संघर्ष और अविश्वास की गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। बिहार विधानसभा चुनाव-2025 में मिली बुरी हार ने राजद के राजनीतिक तंत्र को पहले ही हिला दिया था। 75 से सीधा 25 सीटों पर सिमट जाना और शीर्ष नेतृत्व पर सवाल उठना स्वाभाविक था। लेकिन इस समय जब एकजुटता और आत्ममंथन की जरूरत थी, लालू परिवार में सार्वजनिक कलह और आरोप-प्रत्यारोप ने स्थिति को कहीं अधिक गंभीर बना दिया। तेजप्रताप यादव का निष्कासन, संजय यादव पर आरोप और अब रोहिणी का परिवार व राजनीति छोड़ने का निर्णय यह दर्शाता है कि राजद सिर्फ विपक्ष की चुनौती नहीं, बल्कि अपनी ही छत के नीचे पहचान, नियंत्रण और नेतृत्व संघर्ष से घिरा हुआ है। राजनीति में सलाहकार और रणनीतिकारों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, लेकिन जब उनका प्रभाव परिवार, भावनाओं और संगठनात्मक संस्कृृति पर भारी पड़ने लगे, तब नुकसान अनिवार्य है। संजय यादव और रमीज को लेकर उठ रहे सवाल इस बात का संकेत देते हैं कि राजद में निर्णय प्रक्रिया और नेतृत्व की चेन ऑफ कमांड पर भी असहमति गहराती जा रही है। ऐसे में भाजपा जैसे प्रतिद्वंद्वी दल इस स्थिति पर नजर न रखें, यह संभव ही नहीं। लेकिन असली प्रश्न यह है कि विपक्ष का राजनीतिक फायदा महत्वपूर्ण है या एक ऐतिहासिक दल का अस्तित्व और उसके भीतर की मानवीय संवेदनाएं? सभी चरण उनके जीवन का हिस्सा रहे हैं। लेकिन शायद यह पहला अवसर है जब राजनीतिक संकट से भी बड़ा पारिवारिक संकट उनके सामने खड़ा है। एक ओर सत्ता समीकरण बदल रहे हैं, दूसरी ओर परिवार टूट रहा है। अब यह लालू प्रसाद यादव के अनुभव और नैतिक नेतृत्व की परीक्षा है कि वे उस परिवार और पार्टी को फिर से कैसे जोड़ते हैं जिसकी पहचान कभी सामाजिक न्याय और सामूहिक संघर्ष से थी। अंतत: यह सवाल सिर्फ राजद के भविष्य का नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के चरित्र का भी है? ऐसे में सवाल है कि क्या राजनीति परिवार को बचाती है या परिवार को खत्म कर देती है? यह फैसला वक्त करेगा, लेकिन रोहिणी की पीड़ा ने आज देश को यह सोचने पर मजबूर जरूर किया है कि सियासत के इस दौर में भावनाओं और रिश्तों की क्या कीमत बची रह गई है। हमें समझने की जरूरत है। रिश्तों की कीमत पर हमारे राजनेता सियासत करते हैं, परंतु इसमें नैतिकता का मूल्य सदा के लिए विलुप्त हो जाता है।
सियासत और परिवार