बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा से देश का सामाजिक-राजनीतिक प्रयोगशाला माना जाता रहा है। यहां की जटिल जातीय संरचना, सामाजिक समीकरण और नेतृत्व के उतार-चढ़ाव राजनीति को लगातार नई दिशा देते रहे हैं। इसी पृष्ठभूमि में आए हालिया विधानसभा चुनाव ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बिहार अक्सर अप्रत्याशित निर्णय लेकर देशव्यापी  राजनीति को चौंकाने की क्षमता रखता है। एनडीए की यह निर्णायक जीत सिर्फ  एक चुनावी सफलता नहीं, बल्कि कई राजनीतिक मिथकों के ध्वंस का संकेत है। सबसे उल्लेेखनीय पहलू यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पहली बार राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है- उस बिहार में जहां आज तक उसका मुख्यमंत्री नहीं रहा। भाजपा का यह उदय इस बात का संकेत है कि उसके संगठनात्मक ढांचे और केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति ने राज्य में गहरी पैठ बना ली है। दूसरी ओर जनता दल यूनाइटेड (जदयू) ने सभी पूर्वानुमानों को धत्ता बताते हुए सम्मानजनक दूसरा स्थान हासिल किया है। चुनाव से पूर्व नीतीश कुमार को 'थका हुआ नेताÓ, 'रिटायर होने लायकÓ और 'राजनीतिक रूप से अप्रासंगिकÓ बताने की कोशिशें की गई थीं, किंतु जनता के निर्णय ने इन तमाम दावों को सिरे से खारिज कर दिया। इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह भी है कि भाजपा और जदयू के लिए सत्ता तक पहुंचने का टिकाऊ रास्ता एक-दूसरे के साथ ही संभव है। नीतीश कुमार को 'पलटू रामÓ कहकर आलोचना करने वालों को भी जनता ने स्पष्ट संकेत दे दिया कि नेतृत्व में स्थिरता और प्रशासनिक अनुभव अब भी उनकी दृष्टि में महत्वपूर्ण है। साथ ही भाजपा जो केंद्र में पूर्ण बहुमत से कुछ दूर है, भविष्य में अपनी सरकार को स्थिर रखने के लिए जदयू जैसे सहयोगियों पर निर्भर रहेगी, यह नीतीश कुमार के लिए राजनीतिक रूप से आश्वस्तकारी स्थिति है। विपक्ष का हाल इस चुनाव में निराशाजनक रहा। 2020 के चुनाव में सबसे ज़्यादा सीटें जीतने वाली आरजेडी तीसरे स्थान पर खिसक गई। महागठबंधन की अंदरूनी विसंगतियां, नेतृत्व की अस्पष्टता और समन्वय की कमी ने उसे भारी नुकसान पहुंचाया। वहीं प्रशांत किशोर की नई राजनीतिक पहल भी प्रभाव छोड़ने में असफल रही। अब आने वाले महीनों में जब पश्चिम बंगाल, केरल और तमिलनाडु जैसे विपक्ष-शासित राज्यों में चुनाव होने वाले हैं, तो महागठबंधन के लिए यह समय आत्ममंथन और पुनर्गठन का होगा। एनडीए की जीत के पीछे कई सामाजिक और प्रशासनिक कारण भी स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। महिलाओं को आर्थिक संबल देने वाली योजनाएं, नीतीश कुमार की शराबबंदी जैसी नीतियां और महिला सुरक्षा को लेकर उठाए गए कदमों ने महिला मतदाताओं को विशेष रूप से आकर्षित किया। महिला मतदाताओं का बढ़ा हुआ रिकॉर्ड मतदान प्रतिशत इस जनादेश की दिशा तय करने में निर्णायक रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा कही गई यह बात भी इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है कि विपक्ष के जातीय 'एमवाई समीकरणÓ की जगह भाजपा ने 'महिला और युवा (एमवाई) को नए सामाजिक गठजोड़ के रूप में प्रस्तुत किया और यह प्रयोग सफल रहा। एक अन्य पहलू यह है कि महागठबंधन के एक साथ आने में देर और आपसी रणनीतिक मतभेद उसके लिए भारी पड़े। चुनाव अभियान के अंतिम चरण तक समन्वय की कमी ने समर्थकों में भ्रम उत्पन्न किया। इसके विपरीत, भाजपा का चुनावी प्रबंध, अमित शाह की चुनावी कूटनीति और नरेन्द्र मोदी की जनस्वीकार्यता ने मतदान से पहले ही माहौल अपने पक्ष में मोड़ दिया। अंतत: यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार का यह जनादेश सिर्फ  सत्ता परिवर्तन का नहीं है, बल्कि बिहार को तेजी के साथ  विकास के पथ पर अग्रसर करना है। कुल मिलाकर  कहा  जा सकता है कि जनतंत्र में जनता का फैसला अंतिम और सही होता है। इसलिए उसका हर हाल में सम्मान होना चाहिए।